
आँखों में नींद अब उतर जाएगी,
वक्त गुज़रा है जो, अब गुज़र जाएगा।
भीड़ में तन्हा था, शोर थमने लगा,
दिन था जो बुरा, वो सँवर जाएगा।
सागर की हलचल हम सुनने लगे हैं
जरा तुम भी सुनो दिल मचल जायेगा
आसमाँ में उम्मीद का दीपक जला,
हर अँधेरा स्वयं ही बिखर जाएगा।
मुसाफ़िर हूँ है राहें अंजान सी
साथ तेरा मिले ज़िस्त सँवर जायेगा
मौसम-ए-बहार अपने उरूज पे है,
जुल्फें झटको न मौसम बदल जायेगा
हाल पूछो न मेरा ऐ मेरे सनम
तुम जिधर भी चले दिल उधर जायेगा
हौसलों का दिया जलाया है मैंने,
अब अँधेरों से “रवि” उबर जाएगा।
रवि भूषण वर्मा
राँची झारखंड













