
विधा : कविता
मुझे बखूबी याद यह जहाॅं तक ,
शादी समारोह में मिली थी तुम ।
इंतजार था मुझे कहीं मिलोगी ,
किंतु न जाने कहाॅं हो गई गुम ।।
तबसे तनहा तनहा ही रहते रहे ,
तेरी यादों में ही हम खोते रहे ।
सोचता रहा रात भर तेरे लिए ,
तनहा ही पलकें भींगोते रहे ।।
छननी से झाॅंक देखा तुझको ,
आज स्वयं छननी सा हो गए ।
सब्र करते करते बेसब्र हुआ मैं ,
अब तो दलघटनी सा हो गए ।।
परिचय तो मिला नहीं था तेरा ,
शकर सूरत से तुझे पूछते रहे ।
कुढ़ाते रहते थे सारे ही मुझको ,
हम भी अबतक उनसे कुढ़ते रहे ।।
अंत मैंने तो कर लिया संतोष ,
छोड़ा पूछना मैंने मुॅंह मोड़कर ।
कर लिया शादी तेरी याद में मैंने ,
पता चला वो थी रिश्ते तोड़कर ।।
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार ।













