
मुखड़ा-
आ गया सावन सखी री, झूमता गाता हुआ,
हर तरफ़ हरियाली की, चादर है फैलाता हुआ।
अंतरा – 1
ताप धरती का बुझाने, मेघ अंबर से गिरे,
बूंद की पायल पहनकर, हर तरू-पल्लव फिरे।
प्यासी चातक की तपन को, पल में मिटाता हुआ,
हर तरफ़ हरियाली की, चादर है फैलाता हुआ।
अंतरा – 2
डालियों पर पड़ गए हैं, मोद के सुंदर झूले,
गा रही हैं सखियाँ मिलकर, देख मन अपना फूले।
गीत कजरी का सुरीला, प्रेम जगाता हुआ,
हर तरफ़ हरियाली की, चादर है फैलाता हुआ।
अंतरा – 3
काँवरिया पथ पर बढ़े हैं, बोल बम के गूँज से,
पूजते हैं शिव शंभू को, भक्ति के मन-कुंज से।
हर हृदय में आस्था का, दीप जलाता हुआ,
हर तरफ़ हरियाली की, चादर है फैलाता हुआ।
अंतरा – 4
भेद सब आपस के भूले, रूप सावन का अनूप,
भीगता है मन प्रकृति संग, खिल रही आशीष-धूप।
सृष्टि के कण-कण में नूतन, प्राण जगाता हुआ,
हर तरफ़ हरियाली की, चादर है फैलाता हुआ।
रंग सावन का है आया, मन को फिर भिंगोता हुआ,
आ गया सावन सखी री, झूमता गाता हुआ।
पूर्णिमा सुमन कवयित्री/लेखिका
झारखंड धनबाद













