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मन के दोहे

” वंदन है माँ शारदे ,मिले बुद्धि वरदान।
करती सबका मान फिर,मिले मुझे भी मान।।
सेवा करुणा अरु दया,मानवता का भान।
रिश्तों से जुड़कर प्रथम, कहलाऊं इंसान।।
कवि के मन की वेदना, बांचें सब नर – नार।
छाँव – धूप रचती घनी, टीसों का भंडार।।
कवि के मन की वेदना,उमड़े है सब पीर।
कागज – पन्नों में गढ़े, आँखें पीती नीर।।
कवि के मन की वेदना,नहि जाने संसार।
अभिव्यक्ति भावुक बड़ी, कमतर दुख का भार।।
कलमकार का फर्ज है,सुधरें सबके काज।
अनुचित का विरोध करे,बिखरे नहीं समाज।।
कलमकार का फर्ज है, लेखन से दे सीख।
न्याय पीड़ित को मिले,अपराधी को चीख।।
कलम कार का फर्ज है,समरसता का ध्यान।
लालच बिन लिखता रहे,भारत रहे महान।।
जिसकी जैसी भावना,करता तैसा काम।
मन बोए कंटक सभी,मिल पाए नहि आम।।
जिसकी जैसी भावना,दिखता है संसार।
पाप भरा मन भी कभी,करता सद् आचार।।
मजदूरों की जिंदगी,मुश्किल से भरपूर।
,करते नित ही काम फिर,दुख से हरदम चूर।।
धरो मान इनका सभी,मत करना अपमान ।
निर्माता हैं राष्ट्र के,गढ़ते हिंदुस्तान।।

डॉ नवनीता दुबे नूपुर©®

मंडला मध्यप्रदेश।

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