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कविता

खतरनाक समंदर मन के अंदर लील रहा नित पीर पैगंबर!
जो भी निज मन पाप दिखाए भींच दे वह सब पाप बवंडर !!
तुम बिन है यहां कौन धुरंधर मैं पुरंदर तू कलंदर!
बस खेला तेरे मेरे का चौपड खेले देख मतलबंर!
गोते लगते बीच भंवर मे पार न जाता कोई कलंदर!
जब तक मतलब दूर न होता कौन दिखाए राह धुरंधर!
समझा या न समझा बंदर कौन किसका क्लांत निरंतर!
देख ख़ामोश ख़्वाहिश रख अंदर दर्ज सभी महफूज समंदर!


संदीप शर्मा सरल।।
देहरादून उत्तराखंड ।।

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