
पीठ पर टांगे पिट्ठूक बेंग, हाथों में चलती सुटकेस (ट्राली बेंग चके वाली) काँधे पर झूलता एक बड़ा झोला, यात्रा से थका हारा श्याम डोर बेल(घंटी) बजाया।
सुमि ने दरवाजा खोली–
एक तरफ सब सामान फेंकते
श्याम ने सुमि को कसकर गले लगाया – – तुम पिंजरा कहती हो न घर को। मुझे तुम्हारे साथ कैद रहना ही अच्छा लगता है।
श्याम के पिंजरे में सुमि लाज से सिमट चली।
सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जबलपुर













