
लगा क्यूं प्रश्न चिन्ह किताबों पर,
पूछती किताबें यह सवाल है।
ज्ञान संवेदना भाव सब कुछ था,
फिर क्यों दूरी यह मलाल है।
अभिव्यक्त नहीं करती क्या भाषा को,
या प्रकट नहीं करती यह भाव ।
इतिहास नहीं दोहराती क्या यह,
क्या? नहीं मिलते कोई सुझाव।
फिर परित्यक्ता सी क्यूं पड़ी कोने में,
अंतर्द्वंद खुद से ही करती हूं ।
जीवन का दृष्टिकोण दिखाती मेै,
अपना ही अस्तित्व खोज रही हूं।
आधुनिकता की चकाचौंध में,
किस कदर खो गया इंसान ।
फंसा गैजेट्स के माया जाल में
यह देख कर हूं मैं भी हैरान।
नहीं दिखती अब वो भावनाएं,
नहीं वह परिकल्पनाएं।
सत्य का बोध कराती वो परी कथाएं,
और उनमें छुपा था जो ज्ञान।
उर्मिला ढौंडियाल ‘उर्मि’
देहरादून (उत्तराखंड)













