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वक़्त आने दो

बदला जिसे जितना भी लेना है, ले ले आज,
मैं ख़ामोश हूँ, इसे मेरी कमज़ोरी मत समझ।

मेरे हिस्से के दर्द भी तू बेझिझक लिख दे,
मैं हर ज़ख़्म को मुस्कुराकर पढ़ना जानता हूँ।

जब मेरा वक़्त आएगा, तो हिसाब नहीं माँगूँगा,
बस तेरे ज़मीर से एक सवाल पूछूँगा।

तूने जो पत्थर उछाले थे, वही गवाही देंगे,
कौन कितना सच्चा था, वक़्त बता देगा।

दर्द जितना देना है, दे दे पूरे हक़ से,
सब्र की भी अपनी एक तलवार होती है।

मैं बदले का नहीं, वक़्त का इंतज़ार करता हूँ,
क्योंकि वक़्त जब फ़ैसला करता है,
तो किसी अदालत की ज़रूरत नहीं पड़ती।

याद रखना –
चेहरे बदलने से किरदार नहीं बदलते,
और किरदार वाले लोग,
कभी वक़्त से हारते नहीं।

रूपेश कुमार
चैनपुर, सीवान, बिहार

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