
आज दिखावे में लगा, सारा ही संसार।
तुलना करने में मनुज,करता खर्च हजार।
भूल गए हनुमान को, लूट रहे हैं राम,
मिले कर्म का फल यहीं,इस पर करो विचार।।
आलस को नित त्याग कर, जपो राम का नाम।
मिले आत्म संतोष है, निर्मल हो उर धाम।
सहिष्णुता के भाव से, कटुता करिए दूर,
रश्मि प्रभा फैले जगत,तम काम तमाम।।
हनुमत के सब काम ही, लगता बड़े अजीब।
रंक बने भूपति सहज, भूपति बने गरीब।
ऐसे प्रभु की साधना, करिए सब अभिराम,
मिलती इनकी जब कृपा, बदले तभी नसीब।।
बहती भक्ति प्रवाह सी, सदा हृदय हनुमान।
रहते भय से मुक्त हैं, मर्यादा का ध्यान।
त्रास हरें हर भक्त की,प्रभु से सच्ची प्रीत,
रोम-रोम में राम है, जय-जय कृपा निधान।।
डॉ गीता पांडेय अपराजिता
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश













