
नदी का स्वभाव है,सदा बहते ही रहना,
सीखा ही नही कभी वो,कही रूक जाना,
पर्वत, पहाड से निकली ,वो स्वतंत्र होकर,
उछलते कुदते राह , खुद से ही वो बनाई ।
अपने किनारे बसे सबो को,प्यास बुझाते गई ,
नदी ने अपनी रूप भी बदलते गई ,
कभी जल से भरी लबालब तो कभी सूख गई ,
बाढ का रूप ले सबको कभी कभी डराई ।
तो,जल कम होते ही, खुशिया पाये लोग सभी
इसानो की सभ्यता का विकास ,भी नदी ने की
और इसान उपकार भूलने लगे है,आज जबकि
फिर भी नदी,अपने को दुख ना मानी कभी।
वो सदाव्रत सा निरंतर बहती है,अभी भी,
रोक दिया राह यदि किसी ने नदी का कभी,
तो,फिर भी वो खुश होकर,नयी राह बनाई ,
भला हो सदा जिसमे,ये बाते वो ना भूली कभी ।
चुन्नू साहा पाकूड झारखण्ड













