
विधा- काव्य
शीशा आदमी का अक्स होता है
बदलते समय का अहसास होता है
शीशे मे आदमी का करम दिखाई देता है
शीशे के सामने भविष्य दिखाई देता है
अच्छाई का गरूर बुराई का सुरूर सब वक़्त का तकाजा है
इंसानी दिमाग है बदलते रुत के सब प्यादा है
कर्म सबके एक दिन इंसानी हुकूक की दुआई देता है
शीशे के सामने भविष्य दिखाई देता है
बडा ही संगदिल ये जमाना होता है
आपके वजूद को परखने का जीता जागता पैमाना होता है
जमाने के माफिक शीशा जीवन संघर्ष आजमाइश देता है
शीशे के सामने भविष्य दिखाई देता है
शीशा अस्तित्व की एक पहचान होता है
जीवन परखने का एक बेबाक निशान होता है
जीवन के तराज़ू मे खुद को मापने की वजह सुनाई देता है
शीशे के सामने भविष्य दिखाई देता है
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र













