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कविता

ये प्रश्नचिन्ह सी किताबें कहे तेरी मेरी ही बातें रहकर ख़ामोश भी फिर भी करती शोर सी आंतें।।

इक ढेर के नीचे दबकर बैठी है देखो शरमा कर ,इक वक्त भी इनका था कि कहती थी सब कुछ इतरा कर।।

आदत संवाद की इनकी झकझोर देती कही आकर; तुम लाख छुड़ाओं पीछा भूलती नही है कहीं जाकर।।

कैद इसमे जीवन के सौंदर्य , प्रेम और विरह के सावन ;इसमे ही जीवन के दर्शन इसमे ही मौत के भय पन।।

तुम छू लो अगर ऊंचाई ; तो लोग लिखेंगे आकर :तुम गुम जाओं जो कहीं फिर तब भी गुमनाम प्रभाकर।।

इक नाम ‘सरल’ सा लेना जो छू जाए गहरापन ; और भूल भी गर कही जाओं मोड़ देना वर्का कोई आकर।।

संदीप शर्मा सरल।।
देहरादून उत्तराखंड।।
स्नेहार्थ साहित्यिक समूह।।

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