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खुद से मुलकात

कई दिनों बाद दिल ने कुछ कहा है,
खामोशी की परतों को आज सिला है।

जो शब्द कभी होंठों तक न आए,
वो आज आँखों से उतर आए हैं।

थकी हुई रूह ने राहत की साँस ली,
जैसे बंजर धरती ने बारिश ओढ़ ली।

बीते कल की कसक, टूटे विश्वास,
सब पर आज पड़ा है नया सा एहसास।

कभी जो डर हर कदम पर रोकता था,
हर सपने को अधूरा छोड़ जाता था।

आज वही डर पीछे छूट गया,
हौसलों का दीप मन में जल उठा।

रातें जो प्रश्नों से भरी रहती थीं,
जिनमें उम्मीदें अक्सर डरी रहती थीं।

आज उन्हीं रातों ने तारा चुना,
अँधेरे में भी उजाले का पता बुना।

अब हर टूटन भी सबक बनती है,
हर पीड़ा भी ताक़त में ढलती है।

क्योंकि यह नया अहसास सिखाता है,
कि खुद पर यक़ीन ही रास्ता दिखाता है।

डॉ रुपाली गर्ग नारी स्वर
मुंबई महाराष्ट्र

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