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कलम की चलता फिरता अहसास

जब कोई अंतहीन सभा हो और चरणहीन अंत हो
आदि से सीमा जिसकी अनंत हो
एक ऐसा जहाँ चाहिये
ना तुम हो ना हम हो हमारा हो ऐसा एक मुकाम चाहिये
बहुत कहा बहुत सुना एक खामोश जुबाँ चाहिये
ताकीद दिल मे हो दिमाग का ना काम चाहिये
हम समझे वो कहे क्या कहें कि कैसे कहें
ख़ामोश लबों से हाल अपना किससे कहें
पैग़ाम बड़ा सख्त है कि तुम सुनो या हम कहें
हल्लों की दुनियाँ मे खामोशी की क्या कोई औकात है
ना दिल है ना अहसास है ना ही कोई जज़्बात है
खड़े बिल्कुल तन्हा थे खुद की ही एक इम्तिहान मे सिमटे थे
जवाब देते भी क्या जवाब से ही दूर खड़े थे
कर भला तो हो भला खूब सुना था
धड़ को कब्र मे डाल पैरों को फडफडातें हमने जना था
एक जिंदगी थी मजबूरियत के चकाचौन्ध एक हलात थे
जीना था जी लिये ढांचा है एक नही कोई मुकामात् थे
ये तो कुछ एक आवाज थी कुछ बकवास थी
सुनों कि ना सुनों कलम का चलता फिरता एक अहसास थी


संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र

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