
जंगल, झरना, पर्वत, नदियाँ ढूँढते रह जाओगे,
अँधेर नगरी में चिराग़ ढूँढते रह जाओगे।
राक्षस के अवतारों ने काट दिए सब पेड़ को,
शुद्ध हवा का एक झोंका ढूँढते रह जाओगे।
मोबाइल जब से आ गया सबके हाथों हाथ में,
बच्चों में बचपन जवानी ढूँढते रह जाओगे।
खेल कबड्डी दौड़ अखाड़ा चढ़ गए सब मोबाईल की भेंट,
गाँवों की वह खेल-परम्परा ढूँढते रह जाओगे।
लाखों खर्च कर देते पर हम कपड़ा बचाने हैं चले,
सादगी का एक दुपट्टा ढूँढते रह जाओगे।
बंद डिब्बों के स्वादों ने जादू ऐसा कर डाला,
शरबत, लस्सी, छाछ का स्वाद ढूँढते रह जाओगे।
ज़मीन के छोटे टुकड़े पर भाई-भाई बने बैरी हैं,
राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न ढूँढते रह जाओगे।
साधु के वेश में है रावणों की भीड़ खड़ी,
विवेकानंद-सा ज्ञान-वैराग्य ढूँढते रह जाओगे।
बरगद, पनघट, लंबा घूँघट अब दिखते हैं कहाँ,
लाज से झुके हुए वे नयन अब ढूँढते रह जाओगे।
मामा, चाचा, फूफा, मौसा सब के सब”अंकल”हो गए,
रिश्तों वाले अपने संबोधन ढूँढते रह जाओगे।
संगीत हुआ शोर-शराबा, फूहड़पन का बोलबाला,
तानसेन की मधुर अलापें ढूँढते रह जाओगे।
नैतिकता से दूर हुए जब सत्ता के शीर्ष जन,
गाँधी, शास्त्री, पटेल, सुभाष ढूँढते रह जाओगे।
देश लुटेरों की इस भीड़ में देशभक्ति का त्याग कहां,
बटुकेश्वर दत्त, खुदीराम, भगत सिंह ढूँढते रह जाओगे।
नफ़रतों की आग को फैला दिया चहुँ ओर है,
‘रवि’ कहता, अब प्रेम की वाणी ढूँढते रह जाओगे।
रवि भूषण वर्मा
राँची झारखंड













