
कल्पना की कल्पना भी, कल्पना ही रह गई,
दिल में बसी हर आरज़ू, अधूरी ही रह गई।
सोचा था कभी ख़्वाब, हक़ीक़त बनेंगे,
मगर ज़िंदगी तो बस, सोचने की कहानी रह गई।
जिसे पाने की चाहत में, उम्र गुज़रती रही,
वो मंज़िल भी आँखों में, धुंधली-सी रह गई।
हमने तो सजाए थे, कई रंग ज़िंदगी के,
मगर हाथों में बस, ख़ाली तस्वीर रह गई।
कल्पना की कल्पना भी, कल्पना ही रह गई,
दिल में बसी हर आरज़ू, अधूरी ही रह गई।
आर. एस. लॉस्टम













