
हिन्दी हूँ भाषा रही ,जन जन की आवाज,
संस्कृत मेरी माँ रही ;वेदो की जो तात!!
गौरव मय इतिहास मेरा; गौरवमय मेरी बात
विजय पताका सी रही; राष्ट्रीय राज की बात!!
चहुंओर से सहेज कर ;बनी समृद्ध मैं आप ,
तत्सम तदभव शब्द रहे ,सदा ही मेरे साथ!!
कविता सौरठा छंद रहा; प्रेम सुधा बरसात,
उन्नति की चोटी चढ़ी साहित्यिक विधा के साथ!!
गद्य पद्य और रस सभी, सुशोभित सब अलंकार ;
मिलकर है सजा रहे ;दुल्हन सी मुझे आप!!
दिवस न एक मनाइए ; मैं नित की आसार ,
शब्द शब्द मोती मेरा, जैसे मुक्ता हार !!
सरल सरस से शब्द रहे,गूढ है जिनके भाव!
लिखिए,बोलिए और सोचिए बस हिन्दी के साथ!!
संदीप शर्मा सरल !!
देहरादून उत्तराखंड !!












