
थोड़ा-थोड़ा आसमान पिघल रहा,
बूँद-बूँद को तरस रही धरती।
सागर अपनी सीमाएँ लाँघ रहा,
पर्वत भी धीरे-धीरे ढह रहे,
प्रकृति तिल-तिल कर मर रही।
पेड़ों की साँसें कम हो रही हैं,
नदियों की धाराएँ थम रही हैं।
हवा में घुलता ज़हर कह रहा है—
इंसान की तरक्की के पीछे,
कहीं इंसानियत तो नहीं मर रही?
जुल्म के आग़ोश में सत्य निःशब्द है,
झूठ के शोर में सच बेआवाज़ है।
सच पर झूठ की जयकार हो रही,
और खामोशी हर तरफ़ राज़ है।
बेड़ियों में जकड़ा न्याय का परिधान है,
टुकड़ों में बँटा इंसान का ईमान है।
काग़ज़ों में सुरक्षित अधिकार हैं,
मगर ज़मीं पर कितने लाचार इंसान हैं।
न्यायालय हो या विद्यालय,
कार्यालय हो या मंत्रालय—
हर जगह सवाल खड़ा है,
किसके हिस्से में न्याय है
और किसके हिस्से में सिर्फ़ इंतज़ार खड़ा है?
व्यवस्था के गलियारों में
सच अक्सर अकेला मिलता है,
ईमान की आवाज़ दब जाती है,
और झूठ को सहारा मिलता है।
फिर भी उम्मीद बाकी है,
फिर भी एक सवेरा बाकी है।
बस कोई एक दीप जलाए,
तो अँधेरे से लड़ने का
हौसला अभी बाकी है।
— R S Lostom












