
02 अक्टूबर पर विशेष
गांधी वांड्मय
गांधीजी ने अपने दर्शन, चिंतन और साथ साथ उस समय के राजनीतिक वातावरण को भी रेखांकित किया है। उनके लेखन में एक ईमानदारी, पारिदर्शता और सच कहने का जो साहस है, वह उनकी चारित्रिक दृढ़ता को उजागर करता है। सरल भाषा में उन्होंने बहुत ही सुलझे ढंग से अपने विचारों को प्रस्तुत किया है।
-सीए शंकर घनशामदास अंदानी
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गांधी जी के लेखन में हास्य व्यंग्य हैं, कलाचित्र हैं, तल्ख तेवर हैं और एक क्रांतिधर्मिता भी। अपने लेखन में वे इस बात पर जोर देते हैं कि मनुष्य के व्यक्तित्व में एक शौर्य, ओज और पराक्रम होना चाहिए। राष्ट्रपिता गांधीजी प्रखर वक्ता, राजनीतिज्ञ, विचारक, समाज सुधारक होने के साथ साथ एक बेहतरीन लेखक के रूप में भी जाने जाते हैं। उनके लेखन का माध्यम पत्र, पुस्तकें और उनके संपादन में निकलने वाली हरजिन व ग्राम स्वराज पत्रिकाएं थी। जो निश्चय ही वर्तमान लेखकों व विचारकों के लिए मील का पत्थर है। दूसरी तरफ गांधी वांग्मय के रूप मे उनके विचार अनेक खंडों में भी उपलब्ध हैं। आत्मकथा के रूप में उन्होंने अपने जीवन के प्रत्येक पक्ष को स्पष्टवादिता से प्रस्तुत किया है, जिसमें मित्रों के प्रभाव से मांसाहार व धूम्रपान की ओर उन्मुखता अथवा कस्तूरबा के प्रति निष्ठुर व्यवहार बिना लाग लपेट के विर्णत है।
माई एक्सपेरिमेंट्स विथ ट्रूथ में गांधीजी ने अपने दर्शन, चिंतन और साथ साथ उस समय के राजनीतिक वातावरण को भी रेखांकित किया है। उनके लेखन में एक ईमानदारी, पारिदर्शता और सच कहने का जो साहस है, वह उनकी चारित्रिक दृढ़ता को उजागर करता है। सरल भाषा में उन्होंने बहुत ही सुलझे ढंग से अपने विचारों को प्रस्तुत किया है।
विश्व की कुछ एक महत्वपूर्ण आत्मकथाओं में गांधी जी की आत्मकथा का शुमार होता है। गांधीजी ने कुछ भी नहीं छुपाया, बल्कि दांपत्य जीवन के कई अंतरंग संबंधी, मनमुटावों, द्वंद्वों और व्यवहारों को भी उन्होंने लिखा है। जबकि आत्मकथा के बारे मे यह मान्यता है कि इसमें सच कम झूठ ज्यादा होता है। अपनी कमजोरी को छिपाकर बड़प्पन प्रकट करने का भाव ज्यादा होता है। मगर गांधी जी ने अपनी कमजोरियों को भी बेहिचक लिखा है। संवेदनशील मनुष्य की तरह उनका चिंतना, उनका व्यवहार और उनका लेखन है। कहीं भी बड़प्पन थापने जैसा भाव नहीं दिखलाई पड़ता है।
गांधीजी का व्यक्तित्व और कृत्तित्व दोनों में ही एकरूपता है। जैसा वे जीते थे, सोचते थे, वहीं उन्हेंने लिखा भी। हरजिन पत्रिका का संपादन करते हुए उन्होंने संपादकीय व कई महत्वपूर्ण आलेख लिखे, उनकी प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है।
गांधीजी का अहिंसा चिंतन, सांप्रदायिकता सदभाव और समरस समाज के निर्माण का लक्ष्य उनके लेखन में बार-बार झलकता है। छुआछुत, भेदभाव से परे वे एक सुसंस्कृत व सुव्यविस्थत ऐसे राष्ट्र का निर्माण करन चाहते थे, जिसके नागरिकों में नैतिक मूल्य, सांस्कृतिक चिंतन और संवेदनशील संस्कार निहित हों। विश्व मानवता और बंधुत्व के समर्थक राष्ट्रपिता राष्ट्र को सर्वोपरि मानते ते और हर राष्ट्र और उसकी संस्कृति का वे सम्मान भी करते थे। उनका लेखन रूढ़ियों, दासताओं के विरुद्ध एक नैतिक आह्वान भी है और उनके भीतर जो भी सकारात्मक वृत्तियां थीं, वह उनके लेखन में भी कथ्य और तथ्य के रूप में बार बार उभार है। एक समृद्ध परंपरा को समयानुकूल कैसे प्रासंगिक बनाया जाए और उसे आने वाली पीढ़यिों के समक्ष कैसे परोसा जाए, यह गांधी के लेखन की विशेषता है। वे भाषा, शिल्प और अभिव्यक्ति कौशल में इसलिए भी पारंगत दिखते थे कि उनका सतत कर्मवादी जीवन सहज व सरल थी।










