
भारत रत्न, पूर्व प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी, एक बहुत ही साधारण परिवार से थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा सरकारी स्कूल में हुई थी। आगे की पढ़ाई के लिए उन्हें नदी पार कर स्कूल जाना पड़ता था। उनके पिता की मृत्यु उनके शैशवकाल में ही हो गई थी। उनका लालन पालन उनके ननिहाल में हुआ था, वह भी एक ग़रीब परिवार था। अपनी मेहनत और योग्यता के बलपर उन्होंने काशी विद्यापीठ से शास्त्री की परीक्षा उत्तीर्ण की थी और अपना सरनेम श्रीवास्तव हटाकर सदा के लिए शास्त्री रख लिया था।
प्रधानमंत्री रहते हुए भी कहा जाता है कि उनके पास वस्त्र के रूप में मात्र दो या तीन जोड़ी कुर्ता और धोती ही होते थे और उनको रिपेयर भी करके पहन लेते थे।
शायद उनकी ग़रीबी ही एक ऐसी वजह थी कि सत्ता के शिखर पर पहुँचकर भी उन्होंने एक साधारण नागरिक का सामान्य जीवन जिया। उनके पास न अपना घर था और न ही कोई वाहन। शायद ही कोई राजनेता व प्रधान मंत्री इतना सरल व सामान्य नागरिक का जीवन जीता रहा होगा या अभी भी कोई उनके जैसा सरल व सामान्य होगा।
स्वाधीनता आंदोलन में महात्मा, गांधी, जवाहर लाल नेहरू, सरदार पटेल आदि शीर्षस्थ आंदोलन कारियों के साथ सत्रह साल की आयु से ही बढ़ चढ़ कर भाग लेते रहे। अंग्रेजों के विरुद्ध आज़ादी की लड़ाई में कई बार जेल गये, सन् 1921 से ही हर आंदोलन में शास्त्री जी शामिल रहते थे।
नेहरू जी की सरकार में वह गृह मंत्री, रेल मंत्री आदि कई विभागों के मंत्री थे। मात्र एक रेल दुर्घटना की वजह से उन्होंने रेल मंत्री पद से त्याग पत्र दे दिया था।
नेहरू जी की मृत्यु के बाद स्वाभाविक रूप से उन्हें भारत का प्रधानमंत्री बनना पड़ा और एक साल के अंदर ही पाकिस्तान के विरुद्ध युद्ध का सामना देश को करना पड़ा। जिसमें भारत की विजय के बाद ताशकन्द समझौते में उन्हें अंतरराष्ट्रीय दबाव में उन्हें हस्ताक्षर करने पड़े और इस दबाव के तनाव में ही उन्हें हृदयाघात हुआ और 11 जनवरी 1966 को उनका देहावसान हो गया।
गाँधी जी का जन्मदिन भी 02 अक्तूबर था और शास्त्री जी भी 02 अक्तूबर 1904 को जन्में थे और इसीलिए दोनों महापुरुषों का जन्मदिन 02 अक्तूबर को मनाया जाता है।
देश में अन्न की कमी की वजह से प्रधान मंत्री रहते हुए शास्त्री जी ने देश की समस्त जनता से मंगलवार को शाम का भोजन न करने का आवाहन किया था जिसे सारे देश ने सच्चे हृदय से पालन किया। देश में श्वेत क्रांति भी उनके प्रधान मंत्रित्व काल में आयी और पाकिस्तान युद्ध के समय ही उन्होंने “जय जवान, जय किसान” का नारा दिया। सेना के जवानों व किसानों के प्रति यह उनका सम्मान था, संवेदनशीलता थी।
“जय जवान, जय जवान” नारे में ही प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी जी ने “जय विज्ञान” जोड़कर “जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान” का नारा दिया था।
तो ऐसे थे हमारे दूसरे प्रिय प्रधान मंत्री भारत रत्न श्री लाल बहादुर शास्त्री, जिन्होंने भारत के प्रधान मंत्री रहते हुये देश की ग़रीबी देखते हुये अपना वेतन तक लेना छोड़ दिया था। काश, देश को ऐसे सरल और स्वार्थहीन राजनेता उनके बाद भी मिलते!
डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ










