
सबकी खातिर जलते-जलते,
यों खुद को पिघलाना छोड़ दे।
कोई नहीं पढ़ पाता मन के पन्नों को,
हर एक को राज़ बताना छोड़ दे।
जो जैसा सोचे, सोचने दे,
तू सबका दिल बहला न पाएगी,
दुनिया की हर सोच के आगे,
तू खुद को सही साबित न कर पाएगी।
घर, दफ्तर, रिश्ते… सब संभाला तूने,
फिर भी जो इल्ज़ाम लगे,
उन तीखे तानों की चुभन से,
तू खुद को बचाना सीख ले जरा।
तेरे सीने में जो मासूम बच्चा है,
वो यूं रोने के लिए नहीं बना,
तू साफ़-दिल है, रब जानता है,
फिर बंदों से घबराना छोड़ दे।
के वी










