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पत्थरों की दुनियाँ

विधा – काव्य

पत्थरों की दुनियाँ में दिल कहाँ से लाऊँ
राक्षस है हर शख्स यहाँ कैसे जी पाऊं

किस पर एतबार करूँ हर एक लुटेरा लगता है
अपना ही बनकर अपने को ही ठगता है

सुनवाई इस कलयुग में गलती से कोई नहीं है
राम राज भी हो रावणों का कोई अंत नहीं है

गलती करके भी मनुष्य खुद को पाक साफ बताता है
अपराध खुद का छिपाने वास्ते साम दाम दंड लगाता है

जिंदगी किसी की किसी के कारण तबाह हो जाए गुरेज आदमी को तनिक नहीं होता है
कौन किसका है कौन किसके लिये जमाने फ़िज़ा में अफसोस पर रोता है

अब कलयुगी जहाँ मे ईश्वर भी जाने क्यूँ मजबूर नजर आता है
खता इस संगदिल दौर में जीने की थी या खुद को मिटाने की समझ नहीं आता है

नौकियत इसी मे हैं ए मनुष्य पैदा होती औलाद को कोख में ही मार दे
मत लाना इस मुर्दों की बस्ती में कि ज़िंदा लाश जमाना तुम्हे बना दे

निराश जमाने से नहीं खुदा की खुदाई से हो गये
इंसान तो इंसान भगवान भी यहाँ मर गये


संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र

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