
आसमान को जलने दो,
सूरज को झुलसने दो।
पर्वत जितना गरज सके,
धरती को बरसने दो।
अंबर थोड़ा और बुझेगा,
रात अँधेरा और बरसेगा।
सुबह सवेरे को तरसेगा,
दिन को प्यासा ही मरने दो।
पत्थर को पूजा करने दो,
आँखों को झूठा ही रहने दो।
इंसानियत मरती है, मर जाए,
बस आदमी ज़िंदा रहने दो।
सच की आँच को कौन सहेगा,
झूठों का ही मुँह निवाला है।
सच बोलोगे तो कौन सुनेगा,
झूठ यहाँ सबका प्याला है।
आसमान को जलने दो,
सूरज को झुलसने दो।
जब तक आदमी ज़िंदा है,
दुनिया को यूँ ही चलने दो।
R s Lostom












