
घर की नींव सँभाली जिसने, आज वही बेकार हुआ,
जिसने जीवन वार दिया, वह घर में लाचार हुआ।
सत्तर पार की उम्र को अब बोझ समझते हैं,
जिन हाथों ने घर जोड़ा, उन्हीं से आँखें फेरते हैं।
चेहरा एक ही दिखता, पर बोली बदल गई,
मीठी बातों की जगह कटुता मन में पल गई।
शब्दों के तीर चलाकर, दिल को छलनी करते हैं,
घाव दिखाई नहीं देते, फिर भी भीतर मरते हैं।
घर की इज्जत बचाने को वृद्ध रहें चुपचाप,
आँखों में सागर भरकर, पी जाते हर संताप।
कभी वही आवाज़ थी घर की मर्यादा, मान,
आज उसी आवाज़ पर लग जाता है इल्ज़ाम।
दूसरा रूप भी देखो—वाणी जब विष बन जाए,
अपनों का ही दिया दर्द, जीवन भर रह जाए।
बूढ़े वृक्ष की छाया को पत्थर मत समझो,
उसकी झुकी हुई शाखों में अपना कल भी देखो।
वृद्ध नहीं हैं भार—वे अनुभव की चलती पुस्तक हैं,
उनके आशीषों में घर की उजली धड़कन हैं।
सम्मान की दो घड़ियाँ, उनके जीवन में भर दो,
बोल मधुर रखकर उनके मन का दीपक कर दो।
आज वृद्धजन दिवस पर इतना संकल्प करें,
माता-पिता के जीवन में फिर से वसंत भरें।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार












