
कविता
वो दौर कुछ और था कोई पैदल तो कोई साईकिल से आया करते थे डाकिया घर घर हर घर हर किसीका चिट्ठी पहुंचाया करते थे डाकिया,न किसीको जानता था
और न किसीको पहचानता था फिर भी हर किसीका चिट्ठी समय से पहुंचाया करते थे डाकिया आज भले यह दौर वाट्सएप मैसेज और ई मेल का चल रहा है लेकिन
फिर भी काम आता हैं डाकिया क्योंकि किसीका स्पीड पोस्ट लेकर आता है डाकिया आज भी कहीं न कहीं दिख जाता है चिट्ठी डालने बाला लाल डिब्बे यह देख
कर याद आता है मुझे चिट्ठी जो लिखा करता था मैं अपने माता पिता जी को अब समझ में नहीं आता है यह दौर कैसा चल रहा है चिट्ठी लिखना ही भूल गया हूँ मैं
अपने माता पिता जी को क्योंकि इंतज़ार किए बगैर मैसेज मिल जाता है मेरे माता पिता जी को फिर भी सुकून नहीं मिल पातें हैं उनको जो सुकून चिट्ठी में मिलता था मेरे माता पिता जी को।
चन्दे पासवान उर्फ अलबेला जी मधुबनी बिहार से,











