
जय-जय हे कात्यायनी माता, महिमा अमित तुम्हारी,
सिंहवाहिनी, महिषासुर-मर्दिनि, जग की पालनहारी।
कात्यायन के तप से प्रकटित, दिव्य तेज की धारा,
स्वर्णिम आभा दमक रही है, रूप लगे अति प्यारा।
चतुर्भुजी माँ, खड्ग-कमल से, धर्म-ज्योति फैलाती,
अभय-वरद करुणामय मुद्रा, भक्तों को हर्षाती।
नयन तुम्हारे ज्योति-पुंज हैं, नभ के उजले तारे,
चरण-कमल पर शीश नवाते, भक्त तुम्हारे सारे।
सिंह-गर्जना से गूँज उठे जब, दिशि-दिशि का अँधियारा,
तेरी शक्ति से मिट जाता है, संकट का तम सारा।
श्रद्धा-सुमन चढ़ाकर मैया, दीप हृदय में जलता,
तेरी कृपा-सुधा से जननी, सूना मन भी खिलता।
दुःख की बदली दूर करो माँ, आशा-पुष्प खिलाओ,
भक्ति, शांति और प्रेम-सुधा से, जीवन सफल बनाओ।
जय कात्यायनी, जगदम्बे माँ, करुणा-दृष्टि बरसाओ,
शक्ति, सद्बुद्धि और भक्ति से, जग का मंगल गाओ।
डॉ. सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार













