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जय कात्यायनी माता

चन्द्रहासोज्वलकरा शार्दूलवरवाहना ।
कात्यायनी शुभं दध्यतिवि दानवघातिनी ।।

जय कात्यायनी माता


हे! माता , सुर-नर गावें तेरी भय-मुक्ति की गाथा।

जिस पे वरद् हस्त है तेरा भवबाधा से तर जाता।

महर्षि कात्यायन ने भक्ति में भगवती वर पाया ।

भगवती जन्मी महर्षि के,कात्यायनी नाम धराया।

तेरी महिमा जान कर, जन-जन ने शीश नवाया।

जीवन का अनन्त रहस्य मानव को समझ आया।

योग-साधना में मां कात्यायनी वरद्हस्त वरदाता।

भव्य दिव्यकला से मातृस्वरूप मन में रम जाता।

चतुर्भुजधारी मातृरूप भक्त जन को सदा हर्षाता।

केवल तेरा स्मरण मात्र ही कष्ट से मुक्ति प्रदाता।

वाम हस्त कमल सुशाभित , दूजे खड़ग संभाला।

दक्षिण कर अभय मुद्रा में, इक आशीष विशाला।

सिंह की करे सवारी,केहरि रूप परम विकराला।

असुर से था जग पीड़ित,फैली थी आतंकी ज्वाला

असुर सब भय को पावें, शक्ति दिखे महाकाला।

मायावी महिषासुर का अंत रण में तूंने कर डाला।

मां कत्यायनी की भक्ति – उपासना करे जो नर–

वह अर्थ,धर्म, काम, मोक्ष पाये, नहीं देखे मत्सर।

उसे नहीं सताए रोग,शोक,संताप,भय जीवन भर।

कलियुग हैअनेक महिषासुर विचरें इस धरती पर।

हे मां तूं काल बन,अंत कर दे,विषाक्त ये विषधर।

‘महेश’ करे आह्वान, अवतरित हो इस भू पर।।

     'मां कात्यायनी ' के चरण कमलों में अर्पित।
 -महेश शर्मा --करनाल    

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