नवरात्रि विशेष : भय से रक्षा प्रदान करता है देवी दुर्गा कवच व सप्तशती की आराधना

नवरात्रि विशेष : भय से रक्षा प्रदान करता है देवी दुर्गा कवच व सप्तशती की आराधना : प्रतिभा दुबे ( स्वतंत्र लेखिका)
दुर्गा की आराधना आदि काल से ही अलग अलग कार्यों की सफलता के लिए अलग – अलग रूप में कई प्रकार से की जाती है। आदि शक्ति की पूजा कई लोग देवी के बीज मंत्रों का जाप करके भी करते हैं और नवरात्र के पावन दिनों में इनका जाप करके उनको सिद्धि करते हैं। माता का ऐसा ही एक दुर्लभ साधन है सप्तशती । सप्तशती का सिद्धि प्रदान करने वाला सभी कष्ट निवारण करने वाला स्त्रोत्र है! सप्तशती मैं देवी दुर्गा की समस्त कथा वर्णित है
इसे देवी भागवत भी कहा जाता है । दुर्गा सप्तशती में माता का ” कवच ” भी शामिल है ! आदि काल से ही दुर्गा का कवच सिद्ध करना बहुत दुर्लभ है परंतु यह समस्त कष्टों दुख ,बाधा को हरने वाला है । इसको पड़ने से भय का नाश होता है। सप्तशती में 13 अध्याय हैं जिनका पाठ देवी के अलग-अलग रूपों में देवी के द्वारा दिए गए दर्शन एवं देवताओं को दिए गए आशीर्वाद को संपूर्ण स्वरूप का वर्णन हैं। यहां मैं आपको देवी कवच के बारे में संक्षिप्त रूप से बता रही हूं। कवच के माध्यम से देवी दुर्गा से अपनी समस्त रक्षा करने हेतु प्रार्थना की गई है।
मार्केण्डेय जी ने ब्रह्मा जी से पूछा की मनुष्यों की सब प्रकार से रक्षा करने वाला यदि कोई साधन हो तो बताओ ! ब्रह्माजी ने कहा कि ऐसा एक मात्र देवी का कवच ही है जो परम गोपनीय पवित्र ,उपकारी है उसे श्रवण करने मात्र से सभी प्रकार के भय से रक्षा प्राप्त होती है। देवी की नौ मूर्तियां है ! नवदुर्गे का नाम वेद भगवान द्वारा ही प्रतिपादित हुए है। जो मनुष्य अग्नि में जलते,रणभूमि में शत्रुओं से घिरते समय याद करे , जो विषम संकट में घिरने पर , जो भयातुर होकर कवच द्वारा मां को पुकारे उनका अमङ्गल नहीं होता,युद्धमें विपत्ति नहीं आती है।शोक दुःख भय की प्राप्ति नहीं होती है। उन्हें दुख शोक भय की प्राप्ति नही होती । जो भक्ति पूर्वक माता का स्मरण करते हैं चिंतन करते हैं उनकी माता निसंदेह रक्षा करती है।
कवच प्रारंभ करने से पूर्व मां भगवती की स्तुति कुछ इस प्रकार करना चाहिए कि ” हे महान रौद्र रूप अत्यंत घोर पराक्रम महान बल उत्साहवाली देवी! तुम महान भय का नाश करने वाली हो तुम्हारी और देखना भी कठिन है शत्रुओं का भय बढ़ाने वाली जगदंबिके मेरी रक्षा करे।
भक्तिपूर्वक देवी स्मरण से अभ्युदय होता है! सभी देवीय क्रोध में भक्तों की रक्षा करने हेतु ही रथ पर विराजमान है। शंख चक्र गदा शक्ति हल और मूसल खेटक तोमर लिए,परशु ,पाश कुन्त ओ त्रिशूल उत्तम शारङ्ग धनुष हाथ लिए हुए है । दैत्यों का नाश,भक्तों को अभयदान देना ,देवताओं का कल्याण करना यही उनके अस्त्र और शस्त्र धारण करने का उद्देश्य है।
कवच मैं सभी दिशाओं में रक्षा करने हेतु माता से प्राथना कुछ इस प्रकार की गई है । शरीर के सभी अंगों की भिन्न भिन्न अधिष्ठात्री देवी रक्षा करे। वज्र हस्ता देवी मेरे प्राण,अपान,व्यान,उदान की रक्षा करे। कल्याण शोभना देवी वायु और प्राण की मेरी सदा रक्षा करे।योगिनी देवी रस रूप गन्ध शब्द ओ स्पर्श के अनुभव की रक्षा करे। सत्त्व गुणं रजोगुण तमोगुण की नारायणी देवी रक्षा करे! वाराही आयु ,वैष्णवी धर्म की रक्षा सदा ही करे।चक्रिणी दैवी यश कीर्ति लक्ष्मी धन तथा विद्या की रक्षा करे। इंद्राणी गोत्र की,चण्डिका पशुओं की रक्षा करे। महालक्ष्मी पुत्रों की,भैरवी पत्नी की रक्षा करे। हे विजय शालिनी पाप नाशिनी देवी सम्पूर्ण भयों से हमारी रक्षा करे। कवच सब ओर से मनुष्य की सदा ही रक्षा करे। नित्य देवी कवच पाठ से अभीष्ट चिंतन वस्तु प्राप्त करे।
कवच से सुरक्षित भक्त निर्भय हो जाते है ! तीनों संधयाओ के समय उपासना करता है उन्हें,समस्त सुखों की प्राप्ति होती है। देवी कवच धारी पुरुष राजा सम्मान वृद्धि करता है। देह अंत होने पर भगवती कृपा से पुत्र पौत्र सन्तान को पाते है और अंत में ,दिव्य रूप प्राप्त कर,शिव की कृपा भी पाते है । कवच एक ऐसा दुर्लभ साधन है जिसके करने मात्र से भगवती प्रसन्न होने के साथ-साथ आत्मविश्वास में भी वृद्धि होती है! सप्तश्लोकी के द्वारा कवच की साधना व आराधना कर सकते हैं यह ग्रंथ देवी भगवती कहलाता है जो कि माता की समस्त रूपों का वर्णन 7700 स्लोको में पूर्ण करता है इसलिए ही इसी का नाम दुर्गा सप्तशती रखा गया है।
प्रतिभा दुबे
ग्वालियर (मध्यप्रदेश)













