
महापुरुष अपनी उपलब्धियों का नहीं करते बखान।
वे दूसरों की सफलता में देखते हैं अपनी पहचान।
धरती पर जब छा गया, अंधियारा घनघोर।
जागे तब महापुरुष जन, बनकर ज्ञान की धार।
जिनकी दृष्टि दूर तक देखे,नभ से ऊँचा सिर हो जिनका।
धरा भी जिनके चरण पखारे,यश फैले हो दिशा-दिशा।
सत्य, अहिंसा, प्रेम से, सजी सदा आवाज़।
उनके रास्ते चल पड़े, मिटे पाप के राज।
त्याग, तपस्या, सेवा जिनकी,हर साँस में हो राष्ट्र ध्वनि।
निज सुख छोड़ जनहित जीते,करे न कोई स्वार्थ गणना।
वाणी में जिनकी हो अमृत,विचारों में गंगाजल बहता।
जो सत्य पर अडिग रहें ,अन्याय के सम्मुख न झुकता।
महापुरुष वो दीप समान,जो जलते हैं और जलाते हैं।
खुद राख हो जाएँ लेकिनऔरों को राह दिखलाते हैं।
वे अपनी नीतियों का नहीं करते गर्व का प्रदर्शन।
बल्कि दूसरों की खुशी में देखते हैं अपना जीवन।
श्रेष्ठतम वह व्यक्ति होता है जो दूसरों का सम्मान करता।
उनकी उपलब्धियों को देखकर दिल से प्रसन्न होता।
शिवगंग धारा की तरह जो सबकी प्यास बुझाता।
नीलकंठ बनकर विष को पीकर सबको जीवन देता।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा’ सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार













