
है बिखरा उँजाला,गगन अब न खाली,
कि जैसे गगन में मनी हो दिवाली।
सितारों के बीच,चमकता निशाकर,
यही रात पूनम की सबसे निराली।
सोलह कलाओं से,सज्जित कलानिधि,
लगे रात्रि की आज किरणे मतवाली।
धवल चांदनी खेले,सरिता लहर संग,
रहा न धरा का अब,कोई कोना खाली।
बरसेगा अमृत,आज की रात नभ से,
है औषध से परिपूर्ण,किरणे उजियाली।
बिखरी है शीतलता,किरणों के संग संग,
लो छट गई अमावस,की अब रात काली।
महालक्ष्मी किरणों के,रथ में सवार हो,
देगीं धन वैभव,सभी को खुशहाली।
है शीतल सुहानी सी,रात पूर्णिमा की,
सितारों की सज गई है, बारात आली।
धरा भी सुशोभित है पुलकित है अतिशय,
बह रही है सुगंधित पवन मतवाली।
शरद पूर्णिमा माँ के आशीष वाली,
गोपियों संग कृष्ण की महारास वाली।
आशीर्वचन मिलता,शिव की कृपा से,
शरद पूनम ’पूजा’,बड़ी भाग्यशाली।
अनुजा दुबे’पूजा’
वरुण, महाराष्ट्र













