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मंजिल की राहें इंसानियत छोड़ आए

आज जिंदगी की आपाधापी में
मानव मंजिल की राहें पाने के लिए
इंसानियत छोड़ आए हैं
मंजिल को का लेने की ख्वाहिश एक बुनियादी इंसानी ख्वाहिश है
ख्वाहिश को पूरा करने के लिए जिंदगी का पूरा सफर बिता लेता है
येन- केन प्रकारेण मंजिल को पाना चाहते हैं
पर क्या? ये कभी सोचा है..?
हम मानव है और मानव का धर्म इंसानियत है
इंसानियत अब रहा कहां..?
इंसानियत को दरकिनार कर
कभी अपनी मंजिल को नहीं पा सकते
इंसानियत मानव के अंदर एक संवेदना है
हर जगह लूट -खसोट मची हुई है
घूसखोरी हर जगह व्याप्त है
झूठ का मुखौटा डाले हुए हैं
रिश्ते -नाते सबको भूलते जा रहे हैं
ये कैसी विडम्बना है..?
भाई- भाई का दुश्मन बना हुआ है
दोस्त से सच्ची दोस्ती नहीं
पग- पग पर धोखा देते हैं
मंजिल को हर हाल में पाने के लिए
इंसानियत बिल्कुल ही भूल गए हैं
बिना इंसानियत के एक सफल इंसान
नहीं बन सकता
वक्त तो गुजर जाते हैं खुद पे कर लो भरोसा
पाना है अगर मंजिल तो अडिग रहो
इंसानियत को कभी ना भूलो
बनावटी दुनियां से निकलकर आगे बढ़ना है
हर इंसान के दिल में
इंसानियत होना चाहिए
इंसानियत का फर्ज बिना निभाए
एक सफल इंसान नहीं बन सकता
इंसानियत को कभी मत भूलो
जिंदगी में मंजिल तुम्हारे कदमों को चूमेगी
जिंदगी की रहे भी आसान हो जाएंगी

डॉ मीना कुमारी परिहार

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