
जब मन पर दुःख के बादल, चुपके-चुपके छा जाते हैं,
अधरों पर मुस्कान लिए भी, नयनों से अश्रु आ जाते हैं।
जो कह न सके संसार से, वे भाव कलम अपनाती है,
मौन हृदय की हर धड़कन तब, पीड़ा बन कविता गाती है।
जब अपनों के बदले चेहरे, मन को भीतर तोड़ते हैं,
विश्वासों के कोमल धागे, पल भर में ही छोड़ते हैं।
तब हर टूटा सपना आकर, शब्दों में ढल जाता है,
घायल मन की हर सिसकी से, एक नया गीत गाता है।
पीड़ा केवल आँसू भर नहीं, जीवन का एक अहसास है,
तपकर जो निखरे आत्मा, वही सच्चा सम्मान है।
दुःख की अग्नि में जलकर ही, संवेदन अंकुर पाती है,
तभी किसी कवि की साधना, अमर कविता कहलाती है।
कलम नहीं बस लिखती अक्षर, मन का रक्त बहाती है,
हर पंक्ति के पीछे कोई, अनकही कथा रह जाती है।
पाठक पढ़कर सोच रहा हो—यह मेरी ही कहानी है,
यही सृजन की सच्ची शक्ति, यही कविता की निशानी है।
पीड़ा जब वरदान बने तो, जीवन भी मुस्काता है,
अश्रु-अश्रु का हर मोती, काव्य-सुमन बन जाता है।
जो दुःख को भी दीप बना दे, वही सच्चा कवि कहलाता है,
अपने आँसू जग को देकर, अमर गीत लिख जाता है।
योगेश गहतोड़ी “यश”













