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सुरेन्द्र कुमार सिंह चांस के गीत पर चर्चा करते हुए

— मनोज जैन, संस्थापक – वागर्थ समूह

“जिस्म में कैद कर रौशनी” – यह शीर्षक ही पाठक को उस द्वंद्व की ओर खींचता है जहाँ ‘रौशनी’ जैसी व्यापक और मुक्त अनुभूति को ‘जिस्म’ जैसे सीमित दायरे में कैद कर दिया गया है। कवि सुरेन्द्र कुमार सिंह ‘चांस’ की यह रचना आत्मान्वेषी संवेदना का मार्मिक दस्तावेज है, जहाँ जीवन के उजाले की तलाश लगातार किसी न किसी आवरण में उलझी प्रतीत होती है।

दिन की पहली किरण की प्रतीक्षा, रात के उल्लासपूर्ण राग, दोपहर की तपन में शीतलता की कामना, और एक उजली परछाईं के साथ रौशन चमन की आकांक्षा — ये सभी बिंब हमें उस अनवरत यात्रा की ओर ले जाते हैं जो हर संवेदनशील आत्मा के भीतर चलती रहती है।

कवि के काव्य में एक धीमा उदास संगीत है, एक existential longing है — जहाँ जो कहा गया वह अनसुना रह गया और जो देखा गया वह समय में घुल गया।

वागर्थ समूह के पाठकों के लिए यह रचना विशेष रूप से इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि यह ‘आंतरिक उजाले की तलाश’ को एक सामाजिक और दार्शनिक धरातल पर खड़ा करती है। यह कविता सिर्फ निजी अनुभव नहीं, बल्कि एक व्यापक मानवीय स्थिति का सूक्ष्म रेखांकन भी है।

सुरेन्द्र कुमार सिंह ‘चांस’ की यह रचना हमारे समय, हमारी आकांक्षाओं और हमारे अकेलेपन की एक गूंज है — जिसे सुनना आज की सबसे बड़ी ज़रूरत है।

मनोज जैन
प्रस्तुति
~।।वागर्थ।।~

जिस्म में कैद कर रौशनी
सुरेन्द्र कुमार सिंह चांस

जिस्म में कैद कर रौशनी
हम भटकते रहे उम्र भर
दिन की पहली किरण के लिये ।

दिन के सपने रहे अनदिखे
रात आती थी उल्लास भर
अनसुने,उल्लसित राग पर,
गुनगुनाते रहे उम्र भर
जिंदगी की पहल के लिये।

चांद आया,रहे बेखबर
भोर आया, हुयी दोपहर
गर्म मौसम के आगोश में
कसमसाते रहे उम्रभर
एक शीतल छुअन के लिये।

जो दिखा,घुल गया,वख्त में
जो कहा रह गया अनसुना
एक उजली सी परछाईं संग
खेलते रह गये उम्र भर
एक रौशन चमन के लिये।

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