
‘योगक्षेमं वहाम्यहम्‘
आज से लगभग साढ़े पाँच सौ वर्ष पहले जगन्नाथ पुरी में अर्जुन मिश्र नाम के एक विद्वान ब्राह्मण रहते थे। वे जितने बड़े विद्वान थे, उतने ही अधिक निर्धन भी थे।
आपने सम्पूर्ण महाभारत पर ‘लक्षाभरण’ नाम का संस्कृत में टीका लिखा है। जब लिखते समय आप महाभारत के भीष्म-पर्व पर पहुँचे तो वहां श्रीमद्भगवद्गीता का प्रसंग आया। आपने गीता पर भी प्रसंग अनुसार टीका लिखना प्रारम्भ किया और लिखते-लिखते गीता के नौवें अध्याय तक पहुँचे। नवम् अध्याय की जब आप व्याख्या लिख रहे थे तो बाइसवें श्लोक पर ठहर गये। ‘भगवान ये क्या कह रहे हैं ?
“योगक्षेमं वहाम्यहम् ??”
भक्त तो अनन्यचित्त हो भगवान् की आराधना करके निश्चिन्त हो जाता है पर भगवान अपने भक्तों के योग और क्षेम को सिर पर ढोते रहते हैं, लेकिन उनको जरूरत क्या है ढोने की? क्या इतना पर्याप्त नहीं है कि भगवान अपने भक्तों को योग और क्षेम प्रदान करें और वे भी निश्चिन्त हो जायें! अपने भक्तों के योग-क्षेम को ढोने की क्या जरूरत?
कहीं ऐसा तो नहीं कि भगवान ने गीता में बोला हो “योगक्षेमं ददाम्यहम्” और सुनने वाले ने सुना हो “वहाम्यहम्” और लिखने वाले से भी प्रमाद हो गया हो !
यदि “वहाम्यहम्” के स्थान पर “ददाम्यहम्” लिखा होता तो क्या दिक्कत थी? न तो कोई काव्यदोष होता, न मात्रा ही घटती-बढ़ती, न छन्द बिगड़ता, न भगवान की उदारता में ही न्यूनता आती !
‘ददामि’ – यानी देते हुए भगवान मुझे अच्छे लग रहे हैं।
‘वहामि’ – सिर पर उठाकर ढोने वाले भगवान तो मन को जँच ही नहीं रहे।
बहुत सोच विचार करके उन्होंने “वहाम्यहम्” शब्द से प्रारम्भ के ‘वहा’ को निकाल लिया और ‘ददा’ को उसके स्थान पर जोड़ दिया । बाकी का वैसे का वैसा लिखा रहने दिया। अब “वहाम्यहम्” का बन गया “ददाम्यहम्”। ‘वहा’ शब्द पर पीला लेप लगाकर मिटाया था।
इतना करके वे समुद्र-स्नान के लिए चले गये। इनके घर में तो कुछ खाने-पीने को था नहीं, न ये खाने-पीने की फिक्र ही करते थे।
मिश्र जी की धर्मपत्नी ने सुना कि कोई घर के बाहर उन्हें आवाज दे रहा है। दरवाजा खोलकर देखा तो एक बालक खड़ा है। सिर पर टोकरी रखे है, उस पर दाल, चावल, आटा, घी, नमक, साग-सब्जी आदि भर कर इन्हें देने के लिए आया है।
मिश्र जी की पत्नी ने पूछा – कहाँ से आये हो भाई और तुम्हारे शरीर पर यह चोट कैसी लगी है ? लगता है ज्यादा चोट लगी है, तभी यह पीली हल्दी का लेप लगा रखे हो।
बालक बोला – “माई ! यह साग-सब्जी मिश्र जी ने भेजा है और हमको मार-पीटकर भेजा, तभी चोट लगी है।”
मिश्राणी जी बड़ी नाराज हुई । फिर भी बालक को समझा-बुझाकर भेज दिया। मिश्र जी घर में आये तो उनसे बोलीं – “तुमने उस प्यारे बालक को क्यों मारा ?”
“कौन सा बालक ? मैंने किसी को नहीं मारा।”
“वही जो अपने सिर पर आटा, तेल, साग, सब्जी लेकर आया था। कह रहा था आपने भेजा है।”
“अरे ! न तो मैंने कोई सामग्री ही भेजी है, न ही मुझे मालूम है कि वह बालक कौन था !”
“सांवला-सुन्दर रंग था, शरीर के चोट पर हल्दी का पीला लेप लगा रखा था ।”
अब मिश्र जी को सारी बातें समझ आने लगी। यह गीता तो साक्षात भगवान का वाङ्गमय-स्वरूप होने से इसके अक्षर-अक्षर भगवान के अंग-प्रत्यंग ही हैं। मैंने एक अक्षर को पीले निशान से मिटाने का प्रयास किया। अवश्य ही भगवान के अंग को इससे चोट लगी होगी।
अहो ! त्रिलोक के स्वामी होते हुए भी भगवान मुझ गरीब के लिए घी-नमक-आटे की टोकरी सिर पर वहन कर मेरे दरवाजे पर आ गये ।
मिश्र जी भीतर गये। जो उन्होंने “वहाम्यहम्” की जगह “ददाम्यहम्” लिखा था, उसे हटाकर पूर्ववत लिख दिया — “योगक्षेमं वहाम्यहम्”
इस कथा का सार यही है कि प्राचीन ग्रंथों में जो लिखा गया है वह ईश्वर वचनामृत है। उसमें संशोधन अनुचित है।
संकलन कर्ता:
डा० कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
लखनऊ
03 जुलाई 2025













