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कलियुग

कलियुग है एक झूठी दुनिया, सींचते झूठ से रिश्तों को,
न किसी का कोई है,
बस दिखावे का रिश्ता है,
ऐसा है ये कलियुग।
कलियुग में हिंसा अहंकार
और द्वेष घृणा,
मानव ही मानव को देता
चोट जख्म और पीड़ा,
ऐसा है ये कलियुग।
कलियुग का जानो सच,
सच पे झूठ का मोहर लगता,
झूठ को पहनाया सरताज,
कलंकित है कलियुग,
न सत्य का विजय होता,
ऐसा है ये कलियुग।
कलियुग मानव में स्वार्थ है,
किसी का नहीं निस्वार्थ भाव,
प्रेरणा किसी को नहीं देते,
हर लेते है सबके प्राण,
ऐसा है ये कलियुग।
कलियुग आरंभ,
नारी को लगा आरोप,
नहीं देख पाए कोई,
उन दुष्टों के दुर्व्यवहार को,
सब हो गए अंधे,
मलिन किए मां के आंचल को,
ऐसा है ये कलियुग।
मां ने जन्म दिया,
हुई सृष्टि की रचना,
न समझे मातृत्व भावना,
ये सांसारिक दुनिया,
ऐसा है ये कलियुग।
कलियुग आरंभ हुआ तो,
अंत भी उसका निश्चित है,
कलियुग वाशी जपलो माला,
हरि नाम से मुक्ति है,
ऐसा है ये कलियुग।

नलिनी शैलेन्द्र दास
सरायपाली छत्तीसगढ़

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