
एकांत की उस गहरी चुप्पी में,
जब शब्द भी अपने अर्थ खो बैठते हैं,
मैंने देखा था-
एक-एक झरते पत्तों को।
वे टूट नहीं रहे थे,
बस धीरे-धीरे
अपने वृक्ष से विदा ले रहे थे-
जैसे कोई पुराना सम्बंध
बिना शोर किए समाप्त हो जाता है।
हवा उन्हें दूर ले जाती रही
और वे विरोध भी न कर सके
शायद उन्हें मालूम था
कि बिछड़ना भी
प्रकृति का अनिवार्य गीत है।
धरती पर गिरते हुए
उनके भीतर न कोई शिकायत थी
न कोई क्रोध
सिर्फ एक थकी हुई स्वीकृति-
जैसे रो लेने के बाद
आँखों में बची रह जाती है शांति।
मैं उन्हें देखती रही
और अपने भीतर भी
कुछ झरता हुआ महसूस करती रही-
कुछ स्मृतियाँ,
कुछ अधूरे सपनें,
कुछ ऐसे नाम,
जिन्हें पुकारना अब संभव नहीं।
साँझ और गहरी होती गई
पेड़ विरल होता गया
और पत्तों का वह मौन अवसान
मेरे ह्रदय में उतरता गया।
तब लगा-
हर झरता हुआ पत्ता
दरअसल किसी का अंत नहीं
एक प्रतीक्षा का संकेत है,
क्योंकि वृक्ष जानता है
विरह के सबसे सुने मौसम के बाद भी
कहीं न कहीं
एक बसंत जन्म ले रहा होता है ।।
डॉ. पल्लवी सिंह 'अनुमेहा'
लेखिका एवं कवयित्री
बैतूल, मध्यप्रदेश













