
नित्य प्रति
उस नियंता की ये प्रकृति और ये धरा
बिगड़ी सूरत
नहीं मिलता जिसे कहें व्यवहार खरा ।
शास्त्रोक्त चहूं दिस
कलिकाल का साया दिखाए अब रंग
सद्भावना का हुआ ह्रास
मनों में समाये थे जो स्वपन
अब नित्य-निरंतर
हाथ-पांव होते हुए भी…अब हुए अपंग।
सत्य प्रेम और सत्य ज्ञान का
लुप्त हुआ अब काल
मानव धर्म तिरोहित हो चला
क्या है आसुरी-सा ये जाल
मानव की कुत्सित इच्छाएं … फन उठाएं ज्यूं व्याल ।
आज का यौवन परिस्थिति वश हुआ पथभ्रष्ट
जीवन जीने के नैसर्गिक मूल्य
लिये हैं डस …भयवह काल ने
घिरे अंधकार में …नहीं कहीं दिखे भविष्य स्पष्ट ।
भविष्य को ले कर हर जन खाए हिचकोले
किस से करें फरियाद…
अज्ञात लहरों में घिरे हैं सब
तप्त जल में जूझते जूझते … हाथ पांव में पड़ गए फफोले ।
न देखी थी ऐसी हवा
कहां गए छुप … नहीं कहीं कोई सखा
ये वो बवंडर है … ढूंढे मिले न रस्ता
या यूं कहें … चली जो हवा … बड़ी निष्ठुर और बेवफा ।
हे सृष्टि संचालक !
इस धरा पर वो जगह बता
जहां जा कर शरण मिले
मौसम न बदले चाल
मानवता जहां सुख की सांस ले
शांत सी हवा चले … जीने को मिल जाए हवा मतवाल ।
महेश शर्मा, करनाल













