Uncategorized
Trending

रफ्ता रफ्ता

रफ्ता रफ्ता,ज़िंदगी को मुफ़्त मे खुरचता गया,
मुलाज़मियत कैसी थी कि,सख्ती से कुचलता गया।।

पता तक न चला,कि वक्त किधर गुजर गया,
वक्त था कि ख़्वाहिशों को बेवक्त ही कुतरता गया।।

बाद मे जियूंगा कि ख़्वाहिश मे ख़्वाहिश न रही,
ज़िन्दगी कमबख्त थी की अमल को मुकरता गया।।

होश तब भी न आया,जब पांव लड़खड़ाने लगे,
जोश था कि सब से ही ,चुपके चुपके मुखरता गया।।

आसान नही है,सरल ये खेल खुद से खेलना,
बांट कर के खुद को ही,खुद से ही तो बिखर गया।।

संदीप शर्मा सरल

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *