
अकसर ऐसा क्यों होता है
जो सोचो वह न मिलता है!
अक्सर ऐसा क्यों होता है ??
मांजी जब आवाज लगाती ।।
भैया सुन कर भी ना सुनता ,
मुनिया भागी दौड़ी आती।
मां की मन को खूब समझती ।।
अकसर ऐसा क्यों होता है ?
बापू थककर घर में आते
मम्मी को आवाज लगाते
तुम क्यों, हर दम बैठी रहती
मेरी क्यों ,परवाह ना करती।
मम्मी को कोई नहीं समझता ,
केवल उनके दिल को दुखाता।।
सुबह से शाम ,शाम से रात
मां ही सब की सेवा करती ।
भोजन देती ,कपड़े धोती,
घर को साफ चमकीला करती ।
सबके काम वही सब करती
फिर भी सब उसे कहे निकम्मी ,
क्योंकि वह ना नौकरी करती।।
घर में बैठकर रोटी खाती
दो पैसे भी नहीं कमाती,
मां को लगता सही बात है।।
मैं तो बैठे-बैठे खाती
दो पैसे भी नहीं कमाती ।।
लेकिन क्या यह सत्य बात थी,
मां की कमाई एकदम शून्य थी??
फिर भी सब क्यों उसे बुलाते
एक पल उस बिन जी ना पाते ।
ढंग से काम कोई कर ना पाते,
मां की दम पर ऑफिस जाते।
स्वच्छ वस्त्र और भोजन पाते,
फिर भी वह सम्मान न देते,
अक्सर ऐसा क्यों होता है।।
लेकिन एकदिन सब कुछ बदला
घर में भाभी विवाह कर आई।
मम्मी को वह बहुत ही भाई
मम्मी की वह बहुत दुलारी
रानी बिटिया बहुरिया प्यारी,
वह भी घर में रहकर खाती
ऑफिस वह भी नहीं जाती।।
एक दिन उसने भी सब सुना
पापा ने मां को निकम्मी कहा ।
गुस्सा से भर कलम उठाई
कॉपी में फिर लिस्ट बनाई। ।
एक हफ्ते का हिसाब लगाया ।।
चाय नाश्ता भोजन कपड़ा
जूता पॉलिश रोज का लफड़ा ।।
बात-बात में काम का झगड़ा।।
चाय नाश्ता मैं ही बनाती
भोजन कपड़ा मै ही करती
रात को सबसे बाद में सोती
सुबह सबसे पहले उठती।
पानी भरती झाड़ू लगाती
हर एक काम की लिस्ट बनाई
पैसे की भी सूची थमाई।।
मेरे सारे विल यह भर दो
तब ही आज से खाना बनेगा
तब ही सबके वस्त्र धुलेंगे
तब ही जूते पॉलिश होंगे।।
बिल को देखकर सब घबराए
मां की कीमत आंक ना पाए
मन ही मन वह सब पछताए।।
मां के अच्छे दिन थे आए।।।।
पुष्पापाठक छतरपुर












