
संस्कार का प्रयोजन और उसके भेद—
संस्कार सामान्यतः दो प्रकार के होते हैं—
एक है दोषापनयन ।
दूसरा है गुणाधान ।
कुछ विद्वानों ने इसी के तीन भेद बताएं हैं—
पहला– दोषमार्जन ।
दूसरा– अतिशयाधान । तीसरा– हीनांगपूर्ति ।
किसी दर्पण आदि पर पड़ी हुई धूल आदि सामान्यमल {गंदगी} को वस्त्र आदि से पोंछना हटाना या स्वच्छ करना ‘मलापनयन’ कहलाता है,
फिर किसी रंग या तेजोमय पदार्थद्वारा उसी दर्पण को विशेष चमत्कृत या प्रकाशमय बनाना गुणाधान कहलाता है ।
संसार की कोई भी जड़ या चेतन वस्तु ऐसी नहीं है, जो बिना संस्कार किए हुए मनुष्य के उपयोग में आती हो । उदाहरण के लिए हम अन्न खाते हैं, किंतु खेत में जैसा अन्न होता है वैसा-का-वैसा नहीं खाते ।
*पहले उसको {रौंध} मल’करके दाना निकाला जाता है, भूसी अलग की जाती है उसमें जो दोष हैं उसको दूर करके छानबीन करके मिट्टी कंकण सभी निकालते हैं ।
*यह दोष आप नयन संस्कार है ।*
उसे चक्की में पीसकर आँटा निकाला जाता है, जो गुण उनमें नहीं थे उन्हें लाया जाता है फिर उसमें पानी मिलाकर उसे गूंथकर रोटी बेलकर तवे पर सेंककर खाने योग्य बनाया जाता है ।
यह सभी गुणाधान संस्कार है ।।
कोई भी चीज संस्कारहीन होने पर सभ्य समाज के प्रयोग लायक नहीं होती ।
खेत में जिस रूप में अनाज खड़ा रहता है उसी रूप में गाय भैंस घोड़ा, बछड़ा आज उसे खा जाते हैं, लेकिन कोई मनुष्य खड़े अनाज को खेतों में ही खा नहीं सकता, खाएगा तो लोग कहेंगे कि पशुरूप है, इसलिए संस्कार, संस्कृति और धर्म के द्वारा मानव में मानवता आती है। बिना संस्कृति के और संस्कारों के मानव में मानवता नहीं आ सकती ।।
उत्तम से उत्तम कोटि का हीरा खान से निकलता है उस समय वह मिट्टी आदि अनेक दोषों से दूषित रहता है पहले उसके सारे दोषों से मुक्त किया जाता है, फिर तराशा जाता है तरासने के बाद उसे इच्छा अनुरूप आकार दिया जाता है । यह क्रिया गुणाधान संस्कार है तब वह हार के रूपमे पहनने लायक होता है ।
जैसे-जैसे उसका गुणाधान बढ़ता चला जाता है, वैसे ही मूल्य भी बढ़ता चला जाता है ।
संस्कारों द्वारा ही उसकी कीमत बढ़ी, संस्कार के बिना कीमत कुछ भी नहीं ।
इसी प्रकार संस्कार से विभूषित होने पर ही व्यक्ति का मूल्य और सम्मान बढ़ता है ।
इसलिए अपने यहां संस्कार का बहुत बड़ा महात्म्य व महत्व है ।
मनुष्य में मानवीय शक्ति का आधान होने के लिए उसे सुसंस्कृति होना आवश्यक है, अतः उसका पूर्णतः विधि पूर्वक संस्कार संपन्न करना चाहिए ।।
वास्तव में विधिपूर्वक संस्कार साधन से दिव्यज्ञान उत्पन्न कर आत्मा को परमात्मा के रूप में प्रतिष्ठित करना ही प्रमुख संस्कार है ।
और….
मानव जीवन प्राप्त करने की सार्थकता भी इसी में है । संस्कारों से आत्मा-अंतकरण शुद्ध होता है । संस्कार मनुष्य को पाप और अज्ञानतासे दूर रखकर, आचार-विचार और ज्ञान-विज्ञान से संयुक्त करते हैं ।।
साभार— गीता प्रेस गोरखपुर
लेखन एवं प्रेषण—
पं. बलराम शरण शुक्ल
नवोदय नगर हरिद्वार












