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षोडश संस्कारों की आवश्यकता

संस्कार शब्दका अर्थ—

“सपरिभ्यां करोतौ भूषणे”

इस पाणिनीय सूत्र से भूषण अर्थ में ‘सुट्’ करने पर सिद्ध होता है ।
इसका अर्थ है—
संस्करण,परिष्करण, विमलीकरण तथा विशुद्धीकरण आदि ।
जिस प्रकार किसी मलिन वस्तुको धो-पोंछकर शुद्ध-पवित्र बना लिया जाता है, अथवा जैसे सुवर्ण को आग में तपाकर उसके मलों को दूर किया जाता है और मलके जल जाने पर सुवर्ण विशुद्ध रूपमें चमकने लगता है, ठीक उसी प्रकार से संस्कारों के द्वारा जीवके जन्म-जन्मांतरों से संचित मलरूप निकृष्ट कर्म-संस्कारों का भी दूरीकरण किया जाता है । यही कारण है कि हमारे सनातन धर्म में बालक के गर्भमें आनेसे लेकर जन्म लेने तक और फिर बूढ़े होकर मृत्यु पर्यंत संस्कार किए जाते हैं ।।
काशिकावृत्ति के अनुसार—
उत्कर्ष आधानको संस्कार कहते हैं—
उत्कर्षधानं संस्कारः ।
संस्कार प्रकाश के अनुसार–
अतिशय गुण को संस्कार कहा जाता है—
‘अतिशयविशेष: संस्कारः ।’ मेदिनीकोश के अनुसार, संस्कार शब्दका अर्थ है—
प्रतियत्न, अनुभव अथवा मानसकर्म ।
न्याय शास्त्र के मतानुसार– गुणविशेष का नाम संस्कार है ।
जो तीन प्रकार का होता है—
वेगाख्य संस्कार, स्थितिस्थापक संस्कार,
और भावनाख्य संस्कार ।
सारांश रूप में संस्कार की तीन प्रक्रियाएं हैं—
दोषमार्जन, अतिशयाधान और हीनांगपूर्ति, जिसका व्याख्यान पूर्व में किया गया है ।
संस्कार दीपकमें संस्कार को परिभाषित करते हुए कहा गया है कि—
आत्मा या शरीर के विहित क्रियाके द्वारा अतिशय आधान को संस्कार कहते हैं ।
गर्भाधान आदमी संस्कार पद का प्रयोग लाक्षणिक है ।।
‘तत्र संस्कारो नाम आत्मशरीरान्यतरनिष्ठो विहितक्रियाजन्योऽतिशयविशेषः गर्भाधानादौ संस्कारपदं लाक्षणिकम् ।’
{आगे लेख में संस्कारों की संख्या की जानकारी भेजी जाएगी}
साभार— गीता प्रेस गोरखपुर
लेखन एवं प्रेषण—
पं. बलराम शरण शुक्ल
नवोदय नगर, हरिद्वार

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