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संस्कार प्रकाश- संस्कारों की संख्या

संस्कार की संख्या के विषय में स्मृति शास्त्र में अनेक मत पाए जाते हैं । कहीं ४८ कहीं २५ और कहीं १६ संस्कार बतलाए गए हैं ।।
यथा–
व्यास स्मृति में सोलह संस्कारों के नाम इस प्रकार प्राप्त होते हैं— १गर्भाधान २पुंसवन ३सीमंतोन्नयन ४जातकर्म ५नामकरण ६निष्क्रमण ७अन्नप्राशन ८चूड़ाकरण ९कर्णवेध १०उपनयन ११वेदारम्भ १२केशान्त १३समावर्तन १४विवाह १५विवाहाग्निपरिग्रह, १६त्रेताग्निसंग्रह
गर्भाधानं पुंसवनं सीमान्तो जातकर्म च ।
नामक्रियानिष्क्रमणेऽन्नाशनं वपनक्रिया ।।
कर्णवेधो व्रतादेशो वेदारम्भक्रियाविधि: ।
त्रेताग्निसङ्ग्रहश्चेति संस्कारा: षोडश स्मृता: ।।
{व्यासस्मृति१।१३-१५

अन्य गृह्यसूत्रों में इन संस्कारों के नाम कुछ भिन्न है, जैसे—
गर्भाधान, पुन्सवन, सीमंतोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूडाकरण कर्णवेध, उपनयन, वेदारम्भ, समावर्तन, विवाह, वानप्रस्थ, सन्यास एवं अंत्येष्टि ।।

इनमें प्रथम तीन गर्भाधान पुंसवन तथा सीमांतोन्नयन प्रसव के पूर्व के हैं ।
जो मुख्य माता-पिता द्वारा बीज एवं क्षेत्र की शुद्धि के लिए किए जाते हैं ।।
अग्रिम छः– जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकरण, कर्णवेधतक बाल्यावस्थाके हैं ।
जो परिवार-परिजन के सहयोग से सम्पन्न होते हैं ।।
अग्रिम तीन उपनयन वेदारंभ में समावर्तन विद्याध्ययन से संबद्ध हैं, जो मुख्यतः आचार्य के निर्देशानुसार संपन्न होते हैं ।।
विवाह वानप्रस्थ एवं सन्यास— ये तीन संस्कार तीन आश्रमों के प्रवेश द्वार हैं, तथा व्यक्ति स्वयं इसका निष्पादन करता है और ‘अंत्येष्टि’ जीवन यात्रा का अंतिम संस्कार है, जिसे पुत्र-पौत्र आदि परिवारिक जन तथा इष्ट-मित्रों के सहयोग से किया जाता है ।।
जिसमें प्रथम आठ संस्कार प्रवृत्तिमार्गीय और दूसरे आठ संस्कार निवृत्तिमार्गीय हैं ।।
क्योंकि भगवानमनुने ब्राह्मीयं क्रियते तनु:’ इत्यादि शब्दों के द्वारा संस्कारका लक्ष्य जीवशरीर को ब्रह्मत्व-प्राप्ति के लिए योग्यता का निर्माण कहा है ।।
यह ब्रह्मत्वप्राप्ति निवृत्ति की पराकाष्ठा में ही होना संभव है, इसलिए सोलह संस्कार जो कि प्रवृत्ति-निरोध और निवृत्ति के पोषक हैं जीवात्मा की पूर्णता प्राप्ति के लिए समीचीन जान पड़ते हैं ।
इसलिए द्विजमात्र का शरीर संस्कार वेदोक्त पवित्र विधियों द्वारा अवश्य करना चाहिए; क्योंकि यह संस्कार इस मानव लोक के साथ-साथ परलोक में भी परम पावन है । गर्भावस्थाके आधान पुंसवन एवं सीमांतोन्नयन तथा जन्म के पश्चात् जातकर्म, चूड़ाकरण और उपनयन-आदि

संस्कारोंके समय प्रयुक्त हवन-आदि विधियोंद्वारा जन्मदाता पिता के वीर्य एवं जन्मदात्री माता के गर्भजन्य समस्त दोषोंका शमन हो जाता है तथा वेद-मंत्रों के प्रभाव से नवजात शिशु के अंतःकरण में शुभ विचारों तथा प्रवृत्तियों का उदय होता है ।
इसके साथ-साथ ही उपनयन के प्रयोजनीय वेदारम्भ आदि संस्कारों द्वारा विविध हवनीय विधियों से त्रयी विद्या {ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद}– के स्वाध्याय से गृहस्थाश्रममें पुत्रोत्पादन द्वारा तीन ऋणों {पितृ ऋषि एवं देव}– के अपाकरण तथा पञ्चमहायज्ञ एवं अग्निष्टोमादि यज्ञों के अनुष्ठान से यह शरीर ब्रह्मप्राप्ति {सद्गति या मोक्ष}- का अधिकारी बनाया जाता है ।।
इसी प्रकार महर्षि याज्ञवल्क्यने भी संस्कारों से दोष दूर होना बतलाया है ।।

‘एवमेनः शमं याति बीजगर्भसमुद्भवम् ।’
{आचाराध्याय २।१३}
इस प्रकार संस्कारों की संपन्नता से शारीरिक, मानसिक आदि सभी परिशुध्दियां होती हैं, जिससे मनुष्य प्रेय एवं श्रेय दोनों को प्राप्त करता है । इन संस्कारों का प्रभाव चूँकि अंतःकरण पर भी पड़ता है, अतः उत्तम संस्कारों से अंतःकरण को उत्कृष्ट बनाना चाहिए । इसलिए
जिनके सोलह संस्कार यथाविधि संपन्न होते हैं, वह ब्राह्मपद को प्राप्त करता है ।।
राधेश्याम खेमका जी !!
साभार– गीता प्रेस गोरखपुर
लेखन एवं प्रेषण—
पं. बलराम शरण शुक्ल
नवोदय नगर हरिद्वार

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