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“क्या जरूरी है हम उनसे डर के रहें “


बस , रिवायतें ही तो हैं…..
क्या जरूरी है हम उनसे डर के रहें
खोल दो सोच के बंद पिटारे को
स्वच्छंद विचारों की सरिता बहने दो ।
भुला दो लिंग भेद अब …..
थोड़ा किस्मत हमें भी आजमाने दो ।
मत बांधो …जमाने की बंदिशों में…
कि, हमें भी कुछ कर गुजरना है।
मत, काटो परों को हमारे….
कि, हमें भी परवाज भरना है।
बस, ढील पतंग सी थोड़ी दे दो…
बुलंद हौसले …सारा जहां देखेगा..
बस, एक बार उड़ने दो हमें….
फिर, जमाना हमारी उड़ान देखेगा।

                उर्मि

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