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कविता

इक अलसाई रात जवां सी ,वजह कोई इक बात कहा की,करवटों मे ही सब रह गई,
होना था जिसे आसक्त आलिंगन मे, बाँहों की आगोश प्रियतम के ,जिस्त सिलवटों मे समेटे, सारी रात वह आप से ढह गई।।

किया तो हाँ पूर्ण श्रृंगार था कर्ण मे फूल, मेंहदी महावार, हाँ
पर क्या था कि गर्मी, जिस्म की ,सिमट अपने ही जिस्म मे रह गई।।

कर ही न सकी इक देह आकर्षित, सजकर बैठी और लगी समर्पित,
सावन के तीज त्योहार मे , बिन बरसे
बदरी वह रह गई।।

चूड़ी कंगना, खूब लिए थे,चोटी मे भी फूल गुंथे थे,काजल नयना भरमाने को,सौलह श्रंगार रूप बिंधे थे,
पर क्या ही कहर आ बरपा, बदन तो आज भी तन को तरसा, रात सजी थी जो दुल्हन सी,क्यू विधवा सी आप रह गई।।

कौमार्य अंगडाई लिए था,छुअन को वह बेताब हिय था,सिकुड़न तड़पन कह रही थी,मन केचुंल से बाहर बहे था,क्यूंकर ये बैचैनी फिर ये,प्रिया की अप्रिय सी,आप ही रह गई।।

कोई तो समझे पीड़ा को,दिल के पिघले अरमान जिया को,जो आसक्ति सिफ्त होनी थी,विरहिन की,गठरी मे रह गई।।

वजह क्या कोई संताप कलह थी,या प्रियतम परदेस पिय थी,या फिर अपनी जुबाँ निगोड़ी, जो आपे,विद्वेष लिए थी,
कुछ भी वजह सरल रही हो,रात नही वह गरल बही हो,ये तो थी सरस सी रातें, जो अलसाई आप करे थी।।

संदीप शर्मा सरल
देहरादून उत्तराखंड

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