
आज कक्षा में अध्यापक रोज की तरह बच्चों को पढ़ा रहे थे। उसी समय एक व्यक्ति जो नाई था, स्कूल में अध्यापक के पास आया। उसने अध्यापक से राम-राम की। अध्यापक ने भी राम-राम कहते हुए उससे वहाँ आने का कारण पूछा। नाई ने कहा कि, “बड़ी माता मन्दिर पर यज्ञ हो रहा है, आज वहाँ पूजन-हवन है, उसमें कन्या-भोजन के लिए सभी को बुलाया गया है, इसलिए में यहाँ सभी बालक/बालिकाओं को निमन्त्रण देने आया हूँ। स्कूल के बाद सही बच्चों को आप वहाँ भेज देना। घर पर बस्ता रखकर कपड़े बदलकर सभी मन्दिर पर भोजन हेतु पहुँच जायें।”
“जी, जरुर!” अध्यापक की बात सुनकर वह आश्वस्त होकर वहाँ से चला गया।
अध्यापक ने सभी बच्चों से कहा कि, बच्चों! छुट्टी के बाद आप सबको घर पर अपना-अपना बस्ता रखकर, ड्रेस बदलकर माँ के मन्दिर पहुँचना है, वहाँ आज पूजन-हवन के बाद बिशाल भण्डारा है, जिसमें सभी को भोजन और प्रसाद बितरित किया जायेगा और दक्षिणा भी मिलेगी।”
दक्षिणा का नाम सुनकर सभी बच्चों के चेहरे खुशी से खिल उठे। तभी एक बच्चे ने पूछा, “सर! यज्ञ के बारे में बताइये, यह क्या होता है और कितने प्रकार के होते हैं तथा सबसे श्रेष्ठ यज्ञ कौन-सा होता है?”
“तुमने तो एक साथ अनेक प्रश्न कर डाले! अच्छा, बैठ जाओ! मैं एक-एक करके तुम्हारे सभी प्रश्नों के उत्तर समझाकर कहता हूँ।..सुनो सभी ध्यान से-
यज्ञ पाँच प्रकार के होते हैं,जिन्हें पंचमहायज्ञ कहते हैं। इनके नाम हैं-
ब्रम्ह यज्ञ, देव यज्ञ, पितृ यज्ञ, भृत्ययज्ञ या भूत यज्ञ, अतिथि यज्ञ। ये पाँच यज्ञ पंच महायज्ञ कहलाते हैं।
ब्रम्ह यज्ञ वेदों का अध्ययन करना और ज्ञान प्राप्त करना है। देव यज्ञ देवताओं यानि दिव्य परोपकारी आत्माओं के आवाहन और प्रसन्नता के लिए पूजन-हवन करना। पितृ यज्ञ अपने पितरों, पूर्वजों, जो गुजर चुके हैं, उनको प्रसन्न करने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए उनका तर्पण और श्राद्ध करना। भृत्ययज्ञ या भूत यज्ञ ये यज्ञ सबसे महत्वपूर्ण और कल्याणकारी है, इससे सभी जीवों का भला होता है और सम्पूर्ण प्रकृति का संरक्षण होता है। इसमें सभी जीवों के प्रति दया और सहानुभूतिपूर्वक व्यवहार किया जाता है और उनका पारस्परिक ध्यान रखा जाता है। जैसे- पक्षियों और जानवरों तथा जीव, जल-जन्तुओं को भोजन दिया जाता है ताकि उनकी संख्या बनी रहे। आपने देखा होगा कि विश्व में अनेक जीव-जन्तुओं और जानवरों की प्रजातियाँ धीरे-धीरे नष्ट होने की कगार पर पहुँच गयी हैं। अनेक पक्षी जो पर्यावरण की दृष्टि से लाभकारी थे, वातावरण को स्वस्थ रखते थे, प्रदूषण को फैलने नहीं देते थे। हवा को दूषित नहीं होने देते थे, वह आज दिखाई नहीं देते हैं, जैसे- गिद्ध। इनके न होने पर मरे जानवर इधर-उधर पड़े रहकर वातावरण और हवा को दूषित कर बीमारी फैलाते हैं, ऐसे ही अन्य बहुत से पशु-पक्षी, जीव-जन्तु और जानवर हैं।”
“भृत्ययज्ञ तब तो अधिक महत्वपूर्ण हुआ। इसका ज्ञान सबको होना चाहिए। यह प्रकृति और पुरुषों सभी के लिए लाभदायक है। हम इससे सबका विकास कर सकते हैं।” तभी एक विकास नाम के बच्चे ने कहा। उसकी बहुत सुन्दर बात सुनकर अध्यापक बहुत खुश हुए और बोले, विकास तुमने बहुत उत्तम बात कही है। भृत्ययज्ञ शब्द सीधे तौर पर वेदों या हिन्दू धर्म-ग्रन्थों मे एक विशिष्ट यज्ञ के रूप में नहीं मिलता है, लेकिन पंच महायज्ञ के सन्दर्भ में भूत यज्ञ या बलिवैश्वदेव यज्ञ का एक संभावित पहलू हो सकता है, जो सभी प्राणियों के प्रति सेवा और करुणा को दर्शाता है। भृत्ययज्ञ के तहत मनुष्य को भोजन, जल, और अन्य सहायता प्रदान करने वाले प्राणियों जैसे- मनुष्यों, चाण्डालों, गायों, कुत्तों, कीड़ों आदि का पोषण करना होता है। यह ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ के उपनिषदीय वाक्य में निहित उद्देश्य को पूरा करता है। जबकि अन्तिम अतिथि यज्ञ में भी अतिथियों का सत्कार और सेवा-सुश्रुषा करना शामिल है। जबकि भृत्ययज्ञ किसी विशिष्ट यज्ञ का नाम नहीं है, यह भूत यज्ञ की व्यापक भावना के अन्तर्गत सभी सेवा, करूणा और प्राणी मात्र के प्रति सम्मान को सन्दर्भित करता है।
भूत यज्ञ, जिसे बलिवैश्वदेव यज्ञ भी कहा जाता है, हिंदू धर्म में पंच महायज्ञों में से एक है। यह यज्ञ सभी प्राणियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और उनकी सेवा करने का एक तरीका है। इसमें, घर में भोजन बनाते समय, अग्नि को भोजन का पहला भाग अर्पित किया जाता है और फिर यह भोजन पशु, पक्षी, और अन्य जीवों को दिया जाता है।
भूत यज्ञ का मुख्य उद्देश्य है। सभी जीवों के प्रति करुणा और सम्मान का भाव रखना और उन्हें भोजन, पानी या अन्य आवश्यक चीजें प्रदान करके उनकी सेवा करना। यह यज्ञ, जीव-जन्तुओं के प्रति हमारी जिम्मेदारी का एहसास दिलाता है और हमें प्रकृति के साथ सद्भाव में रहने की प्रेरणा देता है। भूत यज्ञ को कई तरह से किया जा सकता है, जैसे- अन्न-जल दान, भूखे प्राणियों को भोजन और पानी देना, पशु-पक्षियों की देखभाल, उनकी सेवा करना और उन्हें आश्रय देना।
वृक्षारोपण- पेड़ लगाना और उनकी देखभाल करना। पर्यावरण की रक्षा-
प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करना। संक्षेप में, भूत यज्ञ एक ऐसा यज्ञ है जो हमें सभी जीवों के प्रति प्रेम, सम्मान, और कृतज्ञता का भाव रखने की शिक्षा देता है।
भूत यज्ञ- अगर कोई व्यक्ति असहाय प्राणियों (कुत्ता, चिट्टी, कीट, गरीब, बीमार आदि) को गृहस्थ के रूप में भोजन उपलब्ध कराता है तो उसे भूत बलि कहते हैं। प्रतिदिन घर में भोजन पकाते समय अग्नि को भोजन का प्रथम भाग अर्पित करना भूत यज्ञ कहलाता है।
भूतयज्ञ में बलिवैश्वदेव का विधान किया गया है। जिससे पशु-पक्षी, कीट आदि की तृप्ति एवं सेवा होती है। भूतयज्ञ एक ऐसा व्रत है, जिसमें सभी प्रकर के जीवों का पोषण हो जाता है। मनुष्य, चाण्डाल, गाय, बैल, कुत्ता, कीट-पतंग आदि जितने भी प्राणी है, सबकी सुरक्षा और उनके प्रति सहयोगऔर दया की भावना होती है।
हिन्दू धर्म में 5 बलिदान क्या हैं? यज्ञ के सन्दर्भ में इन पाँच बलिदानों को जानें- भूत यज्ञ में अन्न या जल का दान (सभी जीवों के प्रति कृतज्ञता) इस यज्ञ का उद्देश्य पशु-पक्षी और अन्य जीव-जन्तुओं के प्रति आभार व्यक्त करना होता है। इसे अन्न या जल का दान करके, भूखे प्राणियों को भोजन कराकर सम्पन्न किया जाता है। भूत यज्ञ, इसका अर्थ है अपने अन्न में से दूसरे प्राणियों के कल्याण के लिए कुछ भाग देना। मनुस्मृति 3/92 में कहा गया है कि कुत्ता, चींटी, कौआ, पतित, चांडाल, कुष्टी आदि के लिए भोजन निकालकर अलग रख दें। इस प्रकार इसमें सभी कुछ श्रेष्ठ और लाभकारी भाव जो विश्व हितार्थ हैं, आ जाते हैं।”
“सर! आप और अन्य गुरुजन तथा हमारे माता-पिता, बड़े-बुजूर्ग और वेद, पुराण, उपनिषद, गीता और रामायण तथा अन्य धर्म-ग्रन्थ हमें जो शिक्षा और संस्कार देते हैं और भलाई और परोपकार के लिए जो रचनात्मक और अन्य कार्य सिखाते हैं, वे सभी भृत्ययज्ञ या भूत यज्ञ है।”
विकास की बात सुनकर अध्यापक बोले, “हाँ, विकास! भूत अर्थात प्राणी..समस्त प्राणियों के हितार्थ जो कुछ कार्य किए जायें, वही भृत्य अर्थात भूत यज्ञ हैं, बस!”
“सर! ये तो आपने बहुत बड़ी और रहस्य की बात बताई, जो हम जानते हुए भी नहीं जानते थे।” बच्चों की बात सुनकर सर बहुत खुश हुए और बोले, “सभी बच्चे मन्दिर जरूर जाना।”
“हाँ, सर!” सब बच्चों ने एक साथ कहा। “ठीक है, अब तुम जाओ। छुट्टी का समय हो गया है।” सब बच्चे हँसते हुए खुश होकर अपने-अपने बस्ते कन्धे पर टाँगकर घर जाने लगे। सर उन्हें खुश होकर जाते हुए देख रहे थे।
कहानीकार-
पं० जुगल किशोर त्रिपाठी (साहित्यकार)
बम्हौरी, मऊरानीपुर, झाँसी (उ०प्र०)












