
“दे दी हमें आजादी बिना खडग बिना ढाल
साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल
रघुपति राघव राजा राम “
आजादी के पुरोधा पथ प्रदर्शक और महान व्यक्तित्व के धनी सरलता, सौजयन्ता और उदारता की प्रतिमूर्ति और अहिंसा के कटु राष्ट्रीय पिता महात्मा गांधी आज भी उतने ही प्रासंगिक है जितनी की वह उस समय में थे।
“अहिंसा परमो धर्म”के सिद्धांत को नींव बनाकर विभिन्न आंदोलनों के माध्यम से महात्मा गांधी ने देश को गुलामी की जंजीरों से आजाद करवाया। वे अच्छे राजनीतिज्ञ के साथ अच्छे वक्त भी थे। उनके द्वारा बोले गए वचनों को आज भी लोगों द्वारा दोहराया जाता है।”कमजोर कभी माफी नहीं मांगते क्षमा करना तो ताकतवर व्यक्ति की विशेषता है”गांधी जी के वचनों का समाज पर गहरा प्रभाव आज भी देखा जा सकता है। महात्मा गांधी का जन्म 2 अक्टूबर 1867 को पश्चिमी भारत (गुजरात ) के एक तटीय शहर में हुआ था। इनके पिता का नाम करमचंद गांधी तथा माता का नाम पुतलीबाई था। इनके पिता काठियावाड़ की एक छोटी सी रियासत के दीवाने थे। 13 वर्ष की आयु में इनका विवाह कस्तूरबा से हो गया था। इनका बचपन से ही पढ़ाई में मन नहीं था लेकिन बचपन से ही इन्हें उचित और अनुचित का फर्क पता था। इनकी प्रारंभिक शिक्षा पोरबंदर से तथा हाई स्कूल की शिक्षा इन्होंने राजकोट से की। मैट्रिक की पढ़ाई के लिए इनको अहमदाबाद भेज दिया गया। बाद में वकालत इन्होंने लंदन से की। महात्मा गांधी ने कहा कि भारतीय शिक्षा सरकार की नहीं अपितु समाज पर आधारित है इसलिए उन्होंने भारतीय शिक्षा को’द ब्यूटीफुल ट्री’कहा। शिक्षा के क्षेत्र में महात्मा गांधी जी का बहुत योगदान रहा वे चाहते थे कि भारत का हर नागरिक शिक्षित हो। गांधी जी का मूल मंत्र शोषण विहीन का मूल मंत्र शोषण विहीन समाज की स्थापना करना था।
गांधी जी की आधारभूत शिक्षा के सिद्धांत–
*7 से 14 वर्ष तक के बच्चों को अनिवार्य और निःशुल्क शिक्षा मिलनी चाहिए।
*शिक्षा का माध्यम मातृभाषा हो।
*साक्षरता को शिक्षा नहीं कहा जाता है।
*शिक्षा बालकों में मानवीय गुणों का विकास करती है।
देश की आजादी में मूलभूत भूमिका निभाने वाले तथा सभी को सत्य और अहिंसा का मार्ग दिखाने वाले बापू को सर्वप्रथम बापू राज वैद्य जीव राम कालिदास ने 1915 में संबोधित किया। आज इतने वर्षों के बाद भी
संसार इन्हें बापू का कह कर पुकारता है। 1999 में गुजरात के हाईकोर्ट में दाखिल हुए। मुकदमे में जस्टिस बेबीस पारदीवाला ने सभी टेक्सबुक में रविंद्र नाथ टैगोर ने पहली बार गांधी जी को “फादर ऑफ नेशन”कहा यह जानकारी देने का आदेश जारी किया गया।
गांधी जी की दक्षिण अफ्रीका यात्रा–
गांधी जी को भारतीयों पर हो रहे प्रताड़ना को सहना पड़ा। फर्स्ट क्लास ट्रेन की टिकट होने के बावजूद भी उन्हें थर्ड क्लास में आने को कहा गया है इसका विरोध करने पर उन्हें चलती हुई ट्रेन से नीचे फेंक दिया गया। इतना ही नहीं दक्षिण अफ्रीका के कई होटलों में उनका प्रवेश वर्जित कर दिया गया।गांधी जी कुशल राजनीतिज्ञ के साथ साथ अच्छे लेखक भी थे। उन्होंने जीवन के उतार-चढ़ाव को कलाम की सहायता से बखूबी एक पन्ने पर उतारा। गांधी जी ने हरिजन इंडियन अमेरिकन यंग इंडियन अमेरिकन यंग इंडिया में में संपादक का कार्य किया तथा इनके द्वारा लिखी प्रमुख पुस्तक हिंद स्वराज 1909 दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह मेरे सपनों का भारत तथा ग्राम स्वराज है वह गांधीवादी धारा से ओत-प्रोत पुस्तक पुस्तक आज भी समाज में नागरिकों का मार्ग दर्शन करती है।
गांधी जी एक नेतृत्व कर्ता के रूप में:-
भारत वापस लौट के बाद गांधी जी ने ब्रिटिश साम्राज्य से भारतीय स्वतंत्रता की लड़ाई का नेतृत्व किया। उन्होंने कई अहिंसक सविनय अवज्ञा अभियान आयोजित किया और अनेकों बार जेल गए। महात्मा गांधी से प्रभावित होकर लोगों का एक बड़ा समूह, ब्रिटिश सरकार का काम करने से इनकार करने, अदालतों के बहिष्कार करना जैसा कार्य करने लगे। अधिकांश लोगों द्वारा इसका विरोध हुआ तो समाज पर भी इसका व्यापक प्रभाव पड़ा।
30 जनवरी 1948 की शाम को दिल्ली में स्थित बिरला भवन में मोहनदास करमचंद गांधी जी की नाथूराम गोडसे द्वारा गोली मारकर हत्या कर दी गई।
‘महात्मा गांधी के शब्दों में कुछ ऐसा जीवन जियो
जैसे कि तुम कल मरने वाले हो
और कुछ ऐसा सीखो जिससे कि तुम हमेशा के लिए करने वाले हो’
महात्मा गांधी जी इसी सिद्धांत पर आधारित रहकर जीवन व्यतीत करते हुए शहीद हो गए।
आज स्थिति यह है कि हम गांधी जी पर लंबे-लंबे भाषण देते हैं। उनकी चारित्रिक विशेषताओं को उजागर करना अपना परम कर्तव्य समझते हैं लेकिन उस मौलिक दर्शन की बात कोई नहीं करता जिस पर जीवन टिका है। उनके उस दर्शन की बात कोई नहीं करता जिससे व्यक्तित्व का विकास हो। देश को नवीनता मिले। देश आत्म निर्भर बने। यदि हम वास्तव में गांधी जी को देश- दुनियां में सदैव जीवित रखना चाहते हैं तो उनकी विचारधारा को स्वीकार करना होगा अन्यथा महात्मा गांधी केवल पुस्तकों की शोभा बनकर रह जाएंगे।
डॉ मीना कुमारी परिहार













