
समस्त माताओं बहनों एवं बंधुओं को सपरिवार दशहरा की हार्दिक बधाई एवं बहुत बहुत शुभकामनाऍं । मरने के पश्चात आज भी हमें ललकारते और दुत्कारते हुए कह रहा है :
मरे हुए मुझे तीन युग बीत गए ,
लेकिन हर वर्ष जलाया जाता हूॅं ।
मैं तो जलता रहता हूॅं ही मरकर ,
तुम्हें जिंदा जलते ही पाता हूॅं ।।
पहले जिंदा तो कर लो निज को ,
ईर्ष्या द्वेष क्रोधाग्नि में जल रहे ।
मैं मरकर जल रहा हूॅं बार बार ,
तुम जीकर ही बार बार मर रहे ।।
तुम पाले हुए हो स्वयं अहंकार ,
या स्वयं अहंकार गोद पल रहे ।
मैं अहंकार पाल मरा हूॅं एक बार ,
जिसे बार बार जलाने चल रहे ।।
मेरे मातपिता ने नाम रखा गलत ,
फलत: गलत ही मुझे राह मिला ।
ज्ञानी होकर भी गुणरहित हुआ ,
जिसे मार राम का चेहरा खिला।।
राम का नाम तो हुआ दो वर्णों में ,
रावण तीनटिकट महाविकट हुआ ।
नाम का भी लक्षण रहा सही नहीं ,
इसीलिए मौत मेरे निकट हुआ ।।
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार ।













