
चुपके चुपके सबसे छुपके
पता नहीं कब, मेरी डायरी के
प्रथम पन्ने पर, लिख गए थे तुम
एक अक्षर, “प्रिय”–
लोगों की नजर में बाकी पन्ना खाली था।
निमिलित नैनो से उंगलियां फिराई थी मैंने
पन्ने की बाकी लकीरों पर।
जो किसी को ना दिखा वह,
मैंने महसूस किया था।
तुम्हारे दिल का हाल
लकीरों पर फिरती मेरी उंगलियों ने पढ़ा था।
तुम्हारे सौम्य चेहरे को याद किया था,
तुम्हारी हंसती बेजुबान आंखों में
आखिरी लकीरों के वह शब्द मुझे दिखे थे,
” हमेशा ही तुम्हारा”—
सुलेखा चटर्जी













