
आज के युग की यही कहानी,
हर एक विश्वास की यही हे धुरी।
जो सुना वो सच की बातें,
यही हे अंधविश्वास की डोरी।
मैं कहता हूं सच को देख,
अंधविश्वासी को सोचकर देख,
स्वार्थ से ऊपर उठकर बैठ,
अंधविश्वासी प्रवृत्ति छोड़।
आज बनाया अपने आपको,
विश्वासों का खून किया,
क्यों अपने इन हाथों से,
भ्रुण में कन्या मार दिया।
इतना क्या अंधविश्वास के चश्मे,
मासिक चक्र से छीत किया,
वो महिलाओं को दुर्बल समझा,
विश्वासों से घात किया।
आज के युग की यही कहानी,
हर एक विश्वास की यही हे धुरी।
लेखिका कवि-नीतू धाकड़ (अम्बर)नरसिंहगढ़ मध्यप्रदेश













