
क्यूं कहते हो, कि हैं वो नही, वो हैं जो नही, क्यूं कहते हो ?
दिखती तो बस इक देह ही नही,क्या देह को ही माँ तुम कहते हो।।
वो घर मे ही, रहती अब भी,आवाज ही नही न कहते हो,
वो देख रही,और जता भी रही, वो नही फिर ये क्यूं कहते हो।।
हाँ चली गई, वो उनके लिए, जिनके हिय का इक कांटा थी,
बर्दाश्त नही वह उनको थी, मर्यादा को करती ,जो डांटा थी।।
तुम देखो तो भीतर अपने वह आज भी वैसे कौतुक है,
बस दिखाई न देती देह सी ही,वजूद तो उनका मौजूद है।।
हाँ रोक रही वह बिन ही कहे,परंपरा जो घर की साफा थी,
तुम प्रेम पाश मे हो उसके,वह ही तो प्रेम की धागा थी।।
महसूस नही तुम करते हो,जो अब वह जो आभासी है,
उसकी परछाई हर ही कही,दिखती जो उनकी आभा सी है।।
हाँ वहम ही है ,वो तुम्हारे लिए, मेरा अहम मेरी वह माता है,
तुम क्यूं कहते कि है वो नही,जबकि वह ही तो ख्वाजा है।।
उसका ऑचल अब भी तो मुझे ,भिगोए है अपनी खुशबु से,
मैं महक रहा सुगंध से उसकी ,ये चहक मेरी,है खुद उस ही से।।
वो पकड़ कर शिकायत न करती हैं हाँ यह उनकी मजबूरी है,
बस यही दिखती निराशा सी जो आ गई अब वह दूरी है।।
खाली कमरा,बिस्तर खाली,इक खालीपन हुआ है वही,
वो बात नाराज़गी साथ नही,ऑखो से बहता कुछ बाक़ी है।।
पर हाँ मैं अब रोता हूँ नही, जबकि गम भीतर समंदर है,
तुम कहते कि वो चली गई, नही वो मेरे ही अंदर है।।
हाँ वो मेरे ही अंदर है।।
संदीप शर्मा सरल













